लखनऊ।सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरी तरह से सख्त एक्शन में हैं। सीएम योगी यूपी की अफसरशाही पर लगाम कसने की कोशिश में जुटे हैं और पिछले दो महीने में कई आईपीएस और आईएएस अधिकारियों को निलंबित कर चुके हैं,लेकिन बुधवार को पुलिस महानिदेशक को हटाकर यूपी की अफसरशाही को एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है।अगर काम नहीं करेंगे और सरकार को रिजल्ट नहीं देंगे तो आपको किसी पद पर बैठने का औचित्य नहीं है।शायद यही डीजपी मुकुल गोयल के साथ भी हुआ। डीजीपी पर लगातार लापरवाही के आरोप लग रहे थे।





सीएम की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक में न जाना डीजीपी को पड़ा भारी





एक सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि डीजीपी मुकुल गोयल को आधिकारिक काम में दिलचस्पी न लेने, कर्तव्यों की अवहेलना और सामान्य आलस्य के लिए हटा दिया गया है। मुकुल गोयल को डीजी के रूप में नागरिक सुरक्षा के लिए भेजा गया है।सूत्रों का कहना है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विभागीय बैठकों में भाग लेने के लिए मुकुल गोयल से खुश नहीं थे,जो एक परंपरा के रूप में राज्य के पुलिस प्रमुख की अध्यक्षता में माना जाता था। मुकुल गोयल हाल ही में सीएम योगी की अध्यक्षता में हुई कानून व्यवस्था की समीक्षा बैठक में भी शामिल नहीं हुए। सूत्रों का कहना है कि बाद में ये पता चला कि मुकुल गोयल आवेदन करने के बाद छुट्टी पर चले गये थे,लेकिन सरकार में आकाओं को इसके बारे में नहीं बताया था।







यूपी में कई घटनाएं हुईं लेकिन मुकुल गोयल दफ्तर से बाहर नहीं निकले





मुकुल गोयल ने हाल में अपराध स्थलों का भी दौरा नहीं किया और न ही जिला पुलिस प्रमुखों को कोई निर्देश जारी किया।कहानी को अपने पक्ष के लिए मुकुल गोयल तक पहुंचने के बार-बार प्रयास व्यर्थ साबित हुए। मुकुल गोयल गोयल का करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। मुकुल गोयल कई आईपीएस अधिकारियों में शामिल थे जिन्हें 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पुलिस भर्ती में कथित अनियमितताओं के लिए निलंबित कर दिया था। 2013 में मुजफ्फरनगर में दंगे की आग भड़की थी उस मुकुल गोयल एडीजी कानून व्यवस्था थे। डीजीपी के रूप में मुकुल गोयल नियुक्ति के खिलाफ पिछले साल अगस्त में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी।





लगभग ग्यारह महीने ही पद पर रह पाए मुकुल गोयल





आपको बता दें कि 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी मुकुल गोयल ने 2 जुलाई 2021 को उत्तर प्रदेश के महानिदेशक के रूप में कार्यभार संभाला था और लगभग ग्यारह महीने तक डीजीपी रहे।यूपी के तत्कालीन डीजीपी एचसी अवस्थी के सेवानिवृत्त होने पर मुकुल गोयल को बीएसएफ से राज्य कैडर में वापस भेज दिया गया था। 2010 के बाद से चौथे डीजीपी को कार्यकाल से पहले हटाया गया। प्रावधानों के तहत अब तीन वरिष्ठतम आईपीएस अधिकारी नए डीजीपी बनने की दौड़ में होंगे।





अब शुरू होगी नए डीजीपी के लिए रेस





आईपीएस कैडर की ग्रेडेशन सूची में 1987 बैच के आरपी सिंह और जीएल मीणा (दोनों की 1963 जन्मतिथि) और 1987 बैच के (जन्मतिथि 1962) के बिस्वजीत महापात्रा को यूपी के तीन सबसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के रूप में दिखाया गया है,क्यों कि महापात्रा के पास केवल तीन महीने की सेवा शेष है और मानदंडों के अनुसार कार्यालय को डीजीपी के रूप में तैनात होने के लिए न्यूनतम छह महीने की सेवा की आवश्यकता होती है। विश्वजीत महापात्रा की उम्मीदवारी की संभावना नहीं है। सूची में चौथे अधिकारी 1988 बैच (जन्म 1963) के आरके विश्वकर्मा हैं।





गोयल से पहले भी हट चुके हैं तीन डीजीपी





यूपी का पिछला रिकॉर्ड अगर देखा जाए तो 2010 के बाद से गोयल चौथे डीजीपी हैं जिनको मानदंडों के अनुसार राज्य पुलिस प्रमुख के रूप में दो साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले पद से हटाया गया है। यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने 2012 में डीजीपी बृजलाल को पद से हटा दिया था। 2013 में डीजीपी अंबरीश शर्मा को तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए हटा दिया था। इसके बाद 2017 में योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद डीजीपी जावीद अहमद को हटा दिया गया था।