पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने अब पूरी तरह से सख्ती बढ़ा दी है। आयोग के अध्यक्ष राजेश वर्मा के नेतृत्व में हाल ही में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें विशेष रूप से अमृतसर और तरनतारन जिलों के जिलाधिकारियों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य पराली प्रबंधन के लिए उठाए जा रहे कदमों की जमीनी समीक्षा करना और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना था।

जमीनी स्तर पर कार्रवाई तेज करने के निर्देश

CAQM ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासनिक अमले को मैदान में उतरना होगा। केवल कागजी कार्रवाई या मशीनों की उपलब्धता का आंकड़ा गिनाने के बजाय यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि किसानों को जरूरत के वक्त समय पर मशीनरी और अन्य सुविधाएं मिल सकें। इसके साथ ही, किसानों, कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) और मशीनरी प्रदाताओं के बीच बेहतर तालमेल बिठाने पर विशेष जोर दिया गया है।

उद्योगों में पराली के इस्तेमाल को बढ़ावा

पराली का सदुपयोग सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने इसके इन-सीटू (खेतों में ही प्रबंधन) और एक्स-सीटू (खेतों से बाहर उपयोग) के मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू करने को कहा है।

  • ईंधन के रूप में उपयोग: CAQM ने निर्देश दिया है कि थर्मल पावर प्लांटों, ईंट भट्ठों और अन्य औद्योगिक इकाइयों के बॉयलरों में पराली या उससे बने पेलेट (pellets) का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए।
  • निगरानी के लिए नोडल अधिकारी: उद्योगों में पराली के वास्तविक उपयोग की निगरानी और नियमित रिपोर्टिंग के लिए विभिन्न क्षेत्रों में नोडल अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है। दौरे के दौरान CAQM की टीम ने अमृतसर के एक औद्योगिक परिसर का निरीक्षण भी किया, जहां बॉयलर में पराली के पेलेट का ईंधन के रूप में सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। आयोग ने इसे एक बेहतरीन व्यावहारिक उदाहरण बताया।

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तरनतारन जिले पर विशेष फोकस और चेतावनी

तरनतारन में पराली जलाने के मामले अपेक्षाकृत अधिक सामने आने के कारण आयोग ने वहां के उपायुक्त को इस मुद्दे को 'सर्वोच्च प्राथमिकता' देने के निर्देश दिए हैं। CAQM ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि पराली रोकने के अभियानों में यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही या विफलता पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

आयोग का मानना है कि पराली प्रबंधन को केवल खेतों में आग लगाने से रोकने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक और उपयोगी पुनर्चक्रण से जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ इसका आर्थिक लाभ भी मिल सके।

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