नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपने उन 7 राज्यसभा सांसदों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिन्होंने हाल ही में बगावत कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया था। AAP सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन को एक औपचारिक शिकायत भेजकर इन सांसदों की सदस्यता खत्म करने का अनुरोध किया है।
10वीं अनुसूची (दलबदल कानून) का हवाला
संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि यह दलबदल पूरी तरह असंवैधानिक है। उन्होंने उपराष्ट्रपति को भेजी शिकायत में संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) का जिक्र किया है।
गंभीर आरोप: संजय सिंह ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके सांसदों को डराया गया और उन्हें तोड़ा गया। उन्होंने इसे पंजाब के जनादेश और देश के संविधान के साथ धोखा करार दिया।
विशेषज्ञों की राय: AAP ने इस मामले में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य जैसे संवैधानिक विशेषज्ञों से सलाह ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन सांसदों को अयोग्य ठहराया जा सकता है।
क्या कहता है कानून?
इस पूरे मामले में कानूनी पेंच 'दो-तिहाई' (2/3) बहुमत के इर्द-गिर्द घूम रहा है:
विलय (Merger) का नियम: एंटी-डिफेक्शन कानून के मुताबिक, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ टूटकर दूसरी पार्टी में जाते हैं या विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता बची रह सकती है।
AAP का तर्क: पार्टी का मानना है कि जिस तरह से यह दलबदल हुआ है, वह कानून की मूल भावना के खिलाफ है और अयोग्यता की श्रेणी में आता है।
भगवंत मान ने राष्ट्रपति से मांगा समय
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस संकट के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का समय मांगा था। हालांकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि भारत के संविधान में सांसदों या विधायकों को 'वापस बुलाने' (Recall) का कोई प्रावधान नहीं है।
पार्टी की नाकाम कोशिशें
सूत्रों के अनुसार, AAP नेतृत्व को पहले से ही दलबदल की आशंका थी। आखिरी वक्त तक सांसदों को मनाने और रोकने की कोशिशें की गईं, लेकिन वे विफल रहीं और सातों सांसद बीजेपी में शामिल हो गए।
आगे क्या? अब गेंद राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन के पाले में है। वह AAP की शिकायत की समीक्षा करेंगे और तय करेंगे कि क्या इन सांसदों का बीजेपी में जाना कानूनी रूप से वैध है या उनकी सदस्यता रद्द की जानी चाहिए।
एक नजर में मुख्य घटनाक्रम:
शिकायत: उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन को भेजी गई।
मांग: 7 बागी सांसदों की सदस्यता रद्द की जाए।
आधार: संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)।
विपक्षी पक्ष: 2/3 सदस्यों के विलय का कानूनी तर्क।





