पटना: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के 3 अगस्त को आए नतीजों ने राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया है। पिछले 31 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला मानी जाने वाली इस सीट को जनसुराज के संरक्षक प्रशांत किशोर (पीके) ने बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है। पीके ने बीजेपी के उम्मीदवार नीरज सिन्हा को एकतरफा मुकाबले में करारी शिकस्त दी, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की प्रत्याशी रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर खिसक गईं। चुनाव आयोग के अनुसार, मैदान में उतरे कुल 25 उम्मीदवारों में से 23 की जमानत जब्त हो गई।
आखिर कैसे ढहा बीजेपी का मजबूत किला?
अतिआत्मविश्वास और टिकट वितरण में भ्रम: बीजेपी शुरुआत से ही उम्मीदवार को लेकर उलझी रही। पहले अभिषेक बंटी को टिकट दिया गया, फिर नामांकन के अंतिम दिन नीरज सिन्हा के नाम की घोषणा कर दी गई। इसके अलावा नेताओं के बयानों ने भी मतदाताओं को नाराज किया।
मुद्दों और जनआक्रोश का असर: देशव्यापी नीट छात्र आंदोलन, यूजीसी के फैसलों को लेकर अगड़ी जातियों की नाराजगी और भरत तिवारी प्रकरण ने बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाया।
जातिगत दीवारें टूटीं: पहली बार बिहार के किसी चुनाव में जाति का पारंपरिक प्रभाव दरकिनार हो गया। प्रशांत किशोर के व्यक्तित्व और उनके उठाए जनहित के मुद्दों ने जनता को सीधे अपील किया।
विपक्ष का शून्य होना: चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह गौण रही और आरजेडी का प्रचार सुस्त रहा, जिसका पूरा फायदा जनसुराज को मिला।
बांकीपुर के नतीजों का सियासी संदेश
1. बीजेपी के लिए चेतावनी: "गढ़ सिर्फ जनता का होता है"
1995 में नवीन सिन्हा और फिर उनके बाद नितिन नबीन के नेतृत्व में यह सीट 31 वर्षों तक बीजेपी का मजबूत गढ़ रही। लेकिन इस हार ने साफ कर दिया कि जनता के सामने कोई भी किला स्थायी नहीं होता। जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना और कोर वोटर्स की अनदेखी करना पार्टी को भारी पड़ा।
2. सम्राट चौधरी के लिए झटका
प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को मौजूदा शासन के खिलाफ 'जनमत संग्रह' के रूप में पेश किया। पीके ने बीजेपी के पारंपरिक ब्राह्मण और बनिया कोर वोट बैंक में सीधी सेंध लगाई। परिणामस्वरूप, बीजेपी समर्थक या तो वोट देने नहीं निकले या फिर उन्होंने जनसुराज के पक्ष में मतदान किया। 2025 में महज 7 हजार वोट पाने वाली जनसुराज को इस बार 50 हजार से अधिक वोट मिले।
3. तेजस्वी यादव और आरजेडी को सबक
2025 के चुनाव में 46 हजार से अधिक वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहने वाली आरजेडी की प्रत्याशी रेखा गुप्ता इस बार अपनी जमानत बचाने के लिए जूझती नजर आईं। तेजस्वी यादव का शुरुआती दौर में चुनाव प्रचार से दूर रहना पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हुआ। इस जीत के साथ प्रशांत किशोर अब बिहार की राजनीति में एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
4. नितिन नबीन के राजनीतिक आंकलन पर सवाल
बांकीपुर सीट से खुद 5 बार विधायक रहे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के लिए यह हार एक बड़ा व्यक्तिगत झटका है। क्षेत्र की नस-नस से वाकिफ होने के बावजूद वे जनता के बदलते मूड को भांपने में नाकाम रहे और बीजेपी उन इलाकों में भी पिछड़ गई जिन्हें उसका सबसे मजबूत आधार माना जाता था।





