कोलकाता | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की रणभेरी बजते ही राज्य के सियासी मैदान में 'अपनों' ने ही मोर्चा खोल दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) दोनों ही प्रमुख दलों को इस समय बाहरी विरोध से ज्यादा घर के 'विभीषणों' और कार्यकर्ताओं के भारी असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। बांकुड़ा से लेकर हावड़ा तक, टिकट न मिलने या 'बाहरी' उम्मीदवारों को थोपे जाने के विरोध में इस्तीफों और प्रदर्शनों का दौर जारी है।
तृणमूल कांग्रेस: 'पुराने बनाम नए' की जंग
सत्तारूढ़ ममता बनर्जी की पार्टी के भीतर असंतोष की ज्वाला धधक रही है। पार्टी ने इस बार एक कड़ा कदम उठाते हुए 74 निवर्तमान विधायकों के टिकट काट दिए हैं, जिससे बगावत के सुर तेज हो गए हैं।
जमीन पर विरोध: पूर्व बर्द्धमान के खंडघोष और मंतेश्वर में कार्यकर्ताओं ने 'करीबियों' को टिकट देने का आरोप लगाकर सड़क पर प्रदर्शन किया।
अविश्वास का माहौल: उत्तर 24 परगना और हुगली में कार्यकर्ताओं का तर्क है कि निष्क्रिय नेताओं को दोबारा मौका देना हार को निमंत्रण देना है।
कद्दावर नेताओं का दावा: पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी का कहना है कि ये मतभेद छोटे हैं, लेकिन टिकट से वंचित विधायक अब निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
भाजपा: 'भूमिपुत्र' और 'बाहरी' का विवाद
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'स्थानीय बनाम बाहरी' उम्मीदवार का मुद्दा बन गया है। कई क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है।
हावड़ा में सामूहिक इस्तीफा: बाली विधानसभा क्षेत्र में संजय सिंह को 'बाहरी' बताने पर 70 बूथ अध्यक्षों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। बेलुड़ में कार्यकर्ताओं ने प्रत्याशी के सामने ही 'बाहरी वापस जाओ' के नारे लगाए।
बांकुड़ा में भारी विरोध: छातना में वर्तमान विधायक सत्यनारायण मुखोपाध्याय को दोबारा टिकट मिलने पर स्थानीय कार्यकर्ता बिफर पड़े हैं। उनका आरोप है कि विधायक पड़ोसी क्षेत्र के निवासी हैं और उन्होंने क्षेत्र की सुध नहीं ली।
मर्यादा की सीमाएं पार: विष्णुपुर में भाजपा प्रत्याशी शुक्ला चट्टोपाध्याय के खिलाफ अपमानजनक पोस्टर लगाए गए हैं, जिसे उन्होंने विरोधियों की साजिश बताया है।
चुनावी गणित पर असर (एक नजर में)
| जिला | पार्टी | विरोध का मुख्य कारण | स्थिति |
|---|---|---|---|
| हावड़ा | भाजपा | बाहरी उम्मीदवार | 70 बूथ अध्यक्षों का इस्तीफा |
| बांकुड़ा | भाजपा/TMC | स्थानीय (भूमिपुत्र) की मांग | हिंसक प्रदर्शन और नारेबाजी |
| बर्द्धमान | TMC | पुराने चेहरों पर अविश्वास | कार्यकर्ताओं में भारी रोष |
| कालना | भाजपा | दलबदलुओं को प्राथमिकता | कार्यालय में जड़ा ताला |
विश्लेषण: अस्तित्व की लड़ाई
बंगाल की सियासत अब केवल विकास या विचारधारा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह कार्यकर्ताओं के 'अस्तित्व' और 'अधिकार' की लड़ाई बन चुकी है। यदि टीएमसी और भाजपा ने समय रहते इस 'डैमेज कंट्रोल' को नहीं संभाला, तो असंतुष्ट कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा चुनावी नतीजों के समीकरण को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।





