रायपुर: छत्तीसगढ़ की सत्ता गंवाने के ढाई साल बाद कांग्रेस एक बार फिर अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाशने के लिए पूरी ताकत से मैदान में उतरने जा रही है। पार्टी ने इस बार छत्तीसगढ़ की मूल अस्मिता—जल, जंगल और जमीन—को अपना मुख्य हथियार बनाया है। पिछले महीने 20 जून को रायपुर पहुंचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी के कड़े निर्देशों के बाद, प्रदेश कांग्रेस ने आगामी तीन महीनों के लिए एक बेहद आक्रामक राजनीतिक ब्लूप्रिंट तैयार किया है।
पार्टी ने विष्णु देव साय सरकार की नीतियों, विशेषकर विवादित खनन परियोजनाओं और तेजी से बढ़ती 'बुलडोजर कार्रवाई' के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।
1. आंदोलन के मुख्य केंद्र: हसदेव से लेकर बस्तर तक की बिसात
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस राज्य के उन संवेदनशील और प्राकृतिक रूप से समृद्ध इलाकों में व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करेगी, जहां स्थानीय जनता और सरकार के बीच टकराव की स्थिति है:
हसदेव अरण्य: छत्तीसगढ़ का 'फेफड़ा' कहे जाने वाले इस क्षेत्र में कोयला खनन के लिए पेड़ों की कटाई के खिलाफ कांग्रेस अपना विरोध और तेज करेगी।
बस्तर, रायगढ़ और तमनार: इन क्षेत्रों में नई खनन परियोजनाओं, स्थानीय आदिवासियों के विस्थापन और उनकी संस्कृति के संरक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया जाएगा।
यूसीसी (UCC) का विरोध: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर गठित कमेटी और बस्तर के विकास रोडमैप को कांग्रेस ने आदिवासी हितों के खिलाफ बताते हुए इसे विरोध का मुख्य आधार बनाया है।
2. 'बुलडोजर संस्कृति' पर चौतरफा घेराबंदी
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी बढ़ते बुलडोजर के इस्तेमाल को कांग्रेस ने 'गरीब-विरोधी' करार दिया है। इसके तहत दो प्रमुख घटनाओं को केंद्र में रखा गया है:
नवा रायपुर (नकटी गांव): यहाँ कब्जाधारियों के घर तोड़े जाने के बाद से ही कांग्रेस आक्रामक रुख अपनाए हुए है।
प्रतापपुर कार्रवाई: प्रतापपुर में बिना किसी पूर्व नोटिस के आदिवासियों के घरों को ध्वस्त करने की घटना ने सियासी पारे को पहले ही बढ़ा दिया है, जिसे कांग्रेस अब भुनाने की तैयारी में है।
रणनीति: आने वाले 90 दिनों तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव जैसे दिग्गज नेता खुद सड़कों पर उतरकर पदयात्रा, धरना-प्रदर्शन और जनसंपर्क अभियान की कमान संभालेंगे।
सत्ता पक्ष और विपक्ष का आमने-सामने का रुख
| विषय | कांग्रेस (विपक्ष) का स्टैंड | भाजपा (सत्ता पक्ष) का तर्क |
|---|---|---|
| खनन परियोजनाएं | आदिवासियों का विस्थापन और पर्यावरण को नुकसान। | राज्य की आर्थिक प्रगति और बुनियादी ढांचे के लिए आवश्यक। |
| बुलडोजर कार्रवाई | बिना नोटिस आदिवासियों के मकान तोड़ना, गरीब-विरोधी नीति। | सरकारी जमीनों से अतिक्रमण हटाने की कानून सम्मत कार्रवाई। |
| आदिवासी हित | यूसीसी और विकास रोडमैप मूल निवासियों के अधिकारों के खिलाफ। | कांग्रेस केवल आदिवासियों को अपना 'वोट बैंक' समझती है। |
भाजपा का पलटवार: "कांग्रेस के लिए आदिवासी सिर्फ वोट बैंक"
दूसरी तरफ, भाजपा सरकार और उसके संगठन ने कांग्रेस के इस अभियान को सिरे से खारिज किया है। सरकार का स्पष्ट तर्क है कि छत्तीसगढ़ की आर्थिक उन्नति के लिए विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का सही समय पर क्रियान्वयन बेहद जरूरी है।
वहीं, आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड (छत्तीसगढ़) के अध्यक्ष विकास मरकाम ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस ने हमेशा आदिवासियों को सिर्फ एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है और अब सत्ता जाने के बाद वे केवल राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए इन मुद्दों का सहारा ले रहे हैं।
निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ की राजनीति में तपेंगे अगले तीन महीने
न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर सरकार अपनी कार्रवाई को सही ठहरा रही है, लेकिन कांग्रेस ने इसे सीधे जनता की भावनाओं से जोड़ दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ढाई साल के वनवास के बाद 'जल-जंगल-जमीन' के सहारे शुरू हो रहा कांग्रेस का यह 'त्रैमासिक मास्टरप्लान' विष्णु देव साय सरकार की विकासवादी छवि को कितनी चुनौती दे पाता है।
आपको क्या लगता है, क्या 'जल-जंगल-जमीन' का यह पुराना और भावनात्मक मुद्दा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी करा पाएगा या भाजपा का विकास मॉडल भारी पड़ेगा?





