नई दिल्ली | कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से चाबहार बंदरगाह परियोजना के भविष्य पर चिंता व्यक्त की है। उनका आरोप है कि मोदी सरकार ने इस पुरानी परियोजना को नया नाम देकर पेश तो किया, लेकिन अब इसके लिए बजट में कोई जगह नहीं बची है।
कांग्रेस के मुख्य आरोप: "निरंतरता को स्वीकार नहीं करती सरकार"
जयराम रमेश ने अपने बयान में शासन की निरंतरता पर जोर देते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला:
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: रमेश के अनुसार, चाबहार परियोजना की नींव 1990 के दशक के अंत में भारत-अफगानिस्तान-ईरान सहयोग रणनीति के तहत रखी गई थी।
मनमोहन सिंह का योगदान: उन्होंने याद दिलाया कि मई 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने इस परियोजना के लिए 115 मिलियन डॉलर के शुरुआती निवेश को मंजूरी दी थी।
रीपैकेजिंग का आरोप: कांग्रेस नेता ने दावा किया कि अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने इस पुरानी पहल को प्रधानमंत्री की "नई दृष्टि" के रूप में रीपैकेज कर दिया।
बजट 2026-27 और रणनीतिक झटके का डर
जयराम रमेश ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट का हवाला देते हुए पूछा:
शून्य आवंटन: बजट में चाबहार के लिए कोई राशि आवंटित नहीं की गई है। क्या भारत इस प्रोजेक्ट से बाहर हो गया है या निवेश की सीमा समाप्त हो चुकी है?
मध्य एशिया कूटनीति: उन्होंने इसे भारत के लिए दूसरा बड़ा रणनीतिक झटका बताया। इससे पहले ताजिकिस्तान के अयनी (दुशांबे) में स्थित भारतीय वायुसेना बेस को भी बंद किया जा चुका है।
ग्वादर की चुनौती: पाकिस्तान में चीन निर्मित ग्वादर बंदरगाह चाबहार से मात्र 170 किमी दूर है। ऐसे में चाबहार का परिदृश्य से ओझल होना भारत के लिए चिंताजनक है।
भारत के लिए क्यों "गेम-चेंजर" है चाबहार?
चाबहार पोर्ट केवल एक व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
पाकिस्तान का विकल्प: चाबहार के माध्यम से भारत को पाकिस्तान की भूमि का उपयोग किए बिना सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच मिलती है।
ट्रेड रूट: यह उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देशों के साथ व्यापार के लिए सबसे छोटा और विश्वसनीय समुद्री मार्ग है।
चीन का मुकाबला: ग्वादर (पाकिस्तान) में चीन की बढ़ती मौजूदगी को संतुलित करने के लिए चाबहार भारत का सबसे मजबूत कूटनीतिक जवाब माना जाता है।
चाबहार परियोजना: एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| लोकेशन | दक्षिण-पूर्वी ईरान (ओमान की खाड़ी) |
| प्रारंभिक निवेश (2013) | 115 मिलियन डॉलर (प्रस्तावित) |
| कनेक्टिविटी | इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा |
| मुख्य उद्देश्य | मध्य एशिया और रूस तक पहुँच |
निष्कर्ष: जयराम रमेश के इन सवालों ने चाबहार परियोजना की वर्तमान स्थिति पर सस्पेंस बढ़ा दिया है। अब सभी की निगाहें विदेश मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के स्पष्टीकरण पर टिकी हैं कि क्या भारत वास्तव में इस रणनीतिक निवेश से पीछे हट रहा है या यह केवल एक प्रक्रियात्मक बदलाव है।





