नई दिल्ली:
संसद का 25 दिवसीय मॉनसून सत्र (20 जुलाई से 13 अगस्त) शुरू हो चुका है, लेकिन इसके पहले ही दिन जो तस्वीरें सामने आईं, उसने आने वाले दिनों के कड़े टकराव के संकेत दे दिए हैं। नीट (NEET) पेपर लीक, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष के भारी हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही पहले ही दिन बार-बार स्थगित करनी पड़ी।
सुबह 11 बजे जब दोनों सदनों की कार्यवाही शुरू हुई, तो लोकसभा केवल 13 मिनट और राज्यसभा बमुश्किल आधा घंटा ही चल सकी। इसके बाद पूरे दिन महज 2 से 3 मिनट के भीतर सदन स्थगित होता रहा। दोपहर बाद विपक्षी सांसद हाथों में प्लेकार्ड लेकर सदन के वेल में पहुंच गए, जिसके बाद लोकसभा को पूरे दिन के लिए स्थगित कर दिया गया।
सरकार बनाम विपक्ष: एजेंडे पर आर-पार
संसद सिर्फ राजनीतिक बयानों की जगह नहीं है, बल्कि देश के दूर-दराज के गांवों और शहरों की समस्याओं को उठाने का सबसे बड़ा मंच है। लेकिन इस बार टकराव इस बात पर है कि चर्चा की शुरुआत किसके एजेंडे से हो।
सरकार की प्राथमिकता: नए रूप में परिसीमन बिल, महिला आरक्षण संशोधन बिल और PM-CM को हटाने से जुड़ा बिल।
विपक्ष के मुख्य मुद्दे: NEET पेपर लीक, राम मंदिर चढ़ावा चोरी, E-20 पेट्रोल विवाद, पार्टियों को तोड़ना, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी।
सरकार का रुख: "हम नियमों के तहत हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हैं।"
विपक्ष का रुख: "जनता से जुड़े इन गंभीर मुद्दों पर पहले बिना किसी देरी के बहस शुरू हो।"
जब संसद ठप होती है, तो कितना होता है नुकसान?
हंगामे की वजह से जब संसद ठप होती है, तो नुकसान सिर्फ विधायी कार्यों का नहीं होता, बल्कि देश के करदाताओं की गाढ़ी कमाई भी पानी में बह जाती है। आंकड़ों के लिहाज से संसद का एक-एक पल बेहद कीमती है:
₹2.5 लाख प्रति मिनट का खर्च
₹1.5 करोड़ प्रति घंटे का खर्च
₹9 करोड़ प्रति दिन का औसत खर्च (6 घंटे की कार्यवाही के आधार पर)
खर्च कहां होता है? सांसदों के वेतन और भत्ते, संसद सचिवालय, कर्मचारियों की सैलरी, सुरक्षा व्यवस्था, सत्र संचालन और अन्य संसदीय सुविधाओं पर यह भारी-भरकम राशि खर्च होती है।
हंगामे की बलि चढ़ते 'प्रश्नकाल' और 'शून्यकाल'
संसद न चलने से आम जनता का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि उनके स्थानीय मुद्दे (जैसे सड़क, पानी, अस्पताल) सदन तक नहीं पहुंच पाते। संसदीय कार्यवाही की प्रक्रिया इस प्रकार प्रभावित होती है:
1. प्रश्नकाल (सुबह 11 से दोपहर 12 बजे)
यह सरकार की जवाबदेही तय करने का सबसे अहम समय होता है।
तारांकित प्रश्न: इनका मौखिक जवाब दिया जाता है और सांसद पूरक सवाल पूछ सकते हैं (प्रतिदिन अधिकतम 20)।
अतारांकित प्रश्न: इनका लिखित जवाब मिलता है और पूरक सवाल पूछने की अनुमति नहीं होती (प्रतिदिन अधिकतम 230)।
2. शून्यकाल (दोपहर 12 से 1 बजे)
इसमें सांसद बिना किसी विस्तृत पूर्व नोटिस के जनता के तात्कालिक और महत्वपूर्ण मुद्दे उठाते हैं। एक दिन में अधिकतम 20 मुद्दे ही लिए जा सकते हैं।
नोट: संसद नियमों के तहत चलती है। प्रश्नकाल में व्यक्तिगत आरोप, मानहानिकारक टिप्पणी, व्यंग्यात्मक सवाल या किसी के चरित्र पर टिप्पणी करने वाले सवाल पूछने की अनुमति नहीं होती है।
दांव पर लगे हैं वर्ष 2026 के ये महत्वपूर्ण विधेयक
संसद सुचारू रूप से चले तो इस मॉनसून सत्र में कई महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाले बिलों पर चर्चा होनी है:
| विधेयक का नाम | मुख्य उद्देश्य / फोकस | आवंटित चर्चा का समय |
|---|---|---|
| FCRA संशोधन बिल, 2026 | विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और कड़ाई बढ़ाना। | 4 घंटे |
| आयकर संशोधन बिल, 2026 | विदेशी निवेशकों को सरकारी बॉन्ड में आकर्षित करना। | 4 घंटे |
| सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन बिल, 2026 | जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करना। | 4 घंटे |
| जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन बिल, 2026 | देरी से रजिस्ट्रेशन के नियमों में सख्ती लाना। | 4 घंटे |
| राष्ट्रीय सम्मान (अपमान की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026 | राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के अपमान को अपराध की श्रेणी में लाना। | 4 घंटे |
| MSME संशोधन बिल, 2026 | ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और मजबूत भुगतान व्यवस्था पर जोर। | 5 घंटे |
अतीत का रिपोर्ट कार्ड: UPA बनाम NDA
अगर पिछले कुछ कार्यकालों और हालिया सत्रों की उत्पादकता पर नजर डालें, तो संसद के कामकाज का मिजाज इस तरह रहा है:
सदन की उत्पादकता और बैठकें
UPA-1 (2004–09): औसत उत्पादकता 87% (लोकसभा बैठकें: 332 दिन, पास हुए बिल: 248)
UPA-2 (2009–14): औसत उत्पादकता 61% (लोकसभा बैठकें: 356 दिन, पास हुए बिल: 179)
NDA-1 (2014–19): औसत उत्पादकता 84% (लोकसभा बैठकें: 331 दिन, पास हुए बिल: 133)
NDA-2 (2019–24): औसत उत्पादकता 88% (लोकसभा बैठकें: 274 दिन, पास हुए बिल: 179)
हालिया सत्रों का शानदार प्रदर्शन
विंटर सेशन 2025: लोकसभा में 110% और राज्यसभा में 121% काम हुआ।
बजट सेशन 2026: लोकसभा में 93% और राज्यसभा में 110% काम दर्ज किया गया।
निष्कर्ष: हालिया सत्रों में जहां संसद ने अपनी क्षमता से ज्यादा काम करके रिकॉर्ड बनाया था, वहीं मॉनसून सत्र के पहले दिन के हंगामे ने चिंताएं बढ़ा दी हैं। अब देखना होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष इस गतिरोध को तोड़कर जनता के पैसों और समय का सही सदुपयोग कर पाते हैं या नहीं।





