नई दिल्ली/कोलकाता:
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह ढहती नजर आ रही है। राज्य विधानसभा में 58 विधायकों द्वारा नया गुट बना लेने के बाद, अब यह बगावत देश की राजधानी दिल्ली तक पहुँच चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी का संसदीय दल अब महा-टूट के मुहाने पर खड़ा है। पार्टी के लोकसभा और राज्यसभा के कुल 29 सांसद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एक हो चुके हैं और दिल्ली के होटलों में गुप्त रणनीतियों का दौर शुरू हो गया है।
यह सियासी हलचल ऐसे समय पर हो रही है जब आज ही पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी 'INDI' गठबंधन की बैठक में शामिल होने दिल्ली पहुँच रहे हैं।
काकोली घोष दस्तीदार के हाथों में बगावत की कमान!
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसद वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में एकजुट हो चुके हैं। ये बागी सांसद दिल्ली में अपने सरकारी आवासों के बजाय गुप्त रूप से होटलों में ठहरे हुए हैं और कल लोकसभा स्पीकर से मुलाकात कर एक नए 'तृणमूल ब्लॉक' की मांग कर सकते हैं।
"बागी सांसदों का पहला मकसद लोकसभा में अभिषेक बनर्जी को नेता पद से हटाना है, क्योंकि वे उन्हें अपना लीडर मानने को तैयार नहीं हैं। वे संसद के भीतर एक बिल्कुल स्वतंत्र ब्लॉक बनाना चाहते हैं।"
– राजनीतिक सूत्र
हाई-प्रोफाइल बागी: सेलिब्रिटी सांसदों ने बनाई दूरी
पार्टी आलाकमान के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले सांसदों में कई बड़े और चर्चित चेहरे शामिल हैं, जिन्होंने टीएमसी के कार्यक्रमों से पूरी तरह दूरी बना ली है:
दिग्गज और सेलिब्रिटी चेहरे: दीपक अधिकारी (देव), यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी, जून माल्या, पार्थ भौमिक और जगदीश चंद्र बसुनिया।
शूटिंग का बहाना: सांसद जून माल्या कथित तौर पर पार्टी की गतिविधियों को छोड़कर एक ओटीटी (OTT) की शूटिंग में व्यस्त बताई जा रही हैं।
राजीव कुमार और बाबुल सुप्रियो का नाम: सूत्रों का दावा है कि ममता बनर्जी के बेहद करीबी रहे राज्य के पूर्व डीजीपी (IPS) राजीव कुमार और बीजेपी से टीएमसी में आए बाबुल सुप्रियो भी इस बागी गुट के लगातार संपर्क में हैं।
राज्यसभा में भी अकेले पड़े ममता-अभिषेक
TMC के लिए चिंता सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। राज्यसभा में भी पार्टी के 13 सांसदों में से 9 सांसद नेतृत्व के खिलाफ खड़े हैं।
| नेतृत्व के प्रति वफादार सांसद (संभावित) | बगावत की राह पर (संभावित) |
|---|---|
| डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन, मेनका गुरुस्वामी, सागरिका घोष और समीरुल इस्लाम। | कुल 9 सांसद (जो अब ममता-अभिषेक का साथ छोड़ने को तैयार हैं)। |
दलबदल कानून (Anti-Defection Law) से बचने का तगड़ा 'ब्लू प्रिंट'
सवाल यह उठता है कि क्या इन सांसदों की सदस्यता बचेगी? बागी गुट ने इसका पूरा कानूनी तोड़ निकाल लिया है। दलबदल कानून की कार्रवाई से बचने के लिए किसी भी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसदों का समर्थन जरूरी होता है:
लोकसभा का गणित: कुल 28 सांसदों में से करीब 20 सांसद साथ हैं, जो कि दो-तिहाई के आंकड़े (19 सांसद) से ज्यादा है।
बीजेपी का रुख बिल्कुल साफ: 'नो एंट्री'
इस बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। बीजेपी नेतृत्व का संदेश साफ है कि वे फिलहाल तृणमूल के किसी भी बागी सांसद को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करेंगे। ऐसे में बागी सांसदों का यह समूह लोकसभा और राज्यसभा में एक 'स्वतंत्र ब्लॉक' के रूप में ही बैठेगा। अब देखना यह होगा कि फ्लोर कोऑर्डिनेशन (सदन की कार्यवाही) के दौरान इस नए गुट की क्या नीति रहती है।
पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ से जाने के बाद, राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बचाने की कोशिशों में जुटीं ममता बनर्जी के लिए उनके अपने ही कुनबे की यह बगावत अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट बन गई है।





