मुंबई/नाशिक। महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) के नाशिक स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र के नतीजों ने राज्य के सियासी गलियारों में महाभूकंप ला दिया है। एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाले घटनाक्रम में, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बागी और निर्दलीय उम्मीदवार गोकुल गीते ने महायुति गठबंधन (सत्तारूढ़ शिवसेना-शिंदे गुट) के आधिकारिक और बेहद मजबूत उम्मीदवार नरेंद्र दराडे को करारी शिकस्त देकर इतिहास रच दिया है।
सोमवार सुबह आए मतगणना के नतीजों के अनुसार, चुनाव अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इस कड़े मुकाबले में गोकुल गीते को 357 वोट मिले, जबकि सत्ताधारी दल के उम्मीदवार नरेंद्र दराडे महज 248 वोटों पर ही सिमट गए। 109 मतों के इस बड़े अंतर से हुई जीत ने पूरे महायुति खेमे में खलबली मचा दी है।
'गनिमी कावा' रणनीति: नाम वापस लिया पर मैदान नहीं छोड़ा!
नाशिक सीट पर गोकुल गीते की यह जीत महाराष्ट्र की राजनीति के इतिहास में एक अजूबा बन गई है। दरअसल, नामांकन वापस लेने की समय सीमा बीत जाने के बाद तक गोकुल गीते मैदान में डटे हुए थे, जिससे महायुति में दरार बढ़ रही थी।
दिग्गजों की मध्यस्थता: विवाद को सुलझाने के लिए खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, भाजपा मंत्री गिरीश महाजन और शिवसेना मंत्री उदय सामंत को हस्तक्षेप करना पड़ा था।
रणनीतिक सस्पेंशन: वरिष्ठ नेताओं के साथ हुई हाई-प्रोफाइल बैठकों के बाद गीते ने घोषणा की थी कि वे अपना चुनावी अभियान (प्रचार) रोक रहे हैं। हालांकि, तकनीकी रूप से मतपत्र (Ballot Paper) पर उनका नाम कायम रहा।
कार्यकर्ताओं का गुप्त खेल: जीत के बाद गोकुल गीते ने पूरी रणनीति का खुलासा करते हुए साफ किया, "मैंने केवल अपना व्यक्तिगत प्रचार निलंबित किया था, लेकिन मेरे कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने बैकग्राउंड में पूरी ताकत से जमीनी स्तर पर काम जारी रखा। मैंने कभी भी आधिकारिक रूप से उम्मीदवारी वापस नहीं ली थी।"
दराडे का छलका दर्द: काउंटिंग सेंटर छोड़ बाहर निकले
नरेंद्र दराडे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बड़े चेहरे हैं। हाल ही में शिवसेना (UBT) के 6 लोकसभा सांसदों की बगावत के बाद वे और उनका खेमा काफी सुर्खियों में था। दराडे को जीत दिलाने के लिए महायुति के कई मंत्रियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों ने निर्वाचन क्षेत्र में एड़ी-चोटी का जोर लगाया था।
विश्वासघात का आरोप: जैसे ही मतगणना कक्ष में माहौल बदला और स्थानीय प्रतिनिधियों की क्रॉस-वोटिंग (Cross-Voting) उजागर हुई, दराडे बेहद भावुक और नाराज होकर काउंटिंग सेंटर छोड़कर बाहर निकल गए। उन्होंने मीडिया से कहा, "इस चुनाव में मेरे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात हुआ है।"
अनबन की वजह: अपशब्दों और व्यक्तिगत स्वाभिमान की लड़ाई
इस सीट पर बगावत की मुख्य वजह दोनों नेताओं के बीच की पुरानी तल्खी थी। गोकुल गीते ने आरोप लगाया था कि चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र दराडे के परिवार की ओर से उनके खिलाफ बेहद अभद्र और अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिसे उन्होंने अपने स्वाभिमान की लड़ाई बना लिया और गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार के सामने निर्दलीय ही ताल ठोक दी।
6 सीटों पर महायुति की निर्विरोध जीत, 11 सीटों पर हुआ मुकाबला
द्विवार्षिक विधान परिषद चुनावों के तहत शुरुआत में कुल 17 सीटों (एक उपचुनाव सहित) के लिए अधिसूचना जारी की गई थी। लेकिन भाजपा, शिवसेना (शिंदे) और सुनेत्रा पवार की एनसीपी (अजीत पवार गुट) वाले महायुति गठबंधन ने 6 सीटों पर पहले ही निर्विरोध जीत हासिल कर ली थी, जिसके चलते केवल 11 सीटों पर ही मतदान की नौबत आई।
निर्विरोध चुने गए प्रमुख चेहरे:
वर्धा-चंद्रपुर-गढ़चिरौली: अरुण लखानी (भाजपा)
अहिल्यानगर: प्राजक्त तनपुरे (भाजपा - जो नामांकन दाखिल करने से ठीक पहले पार्टी में शामिल हुए थे)
पुणे: विक्रम काकड़े (राकांपा)
रायगढ़-रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग: अनिकेत तटकरे (राकांपा)
ठाणे: रवींद्र फाटक (शिवसेना)
यवतमाल: दुष्यंत चतुर्वेदी (शिवसेना)
विपक्ष का हमला: दूसरी ओर, विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) ने इस चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ गठबंधन ने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों के नामांकन वापस कराने के लिए धनबल और सरकारी तंत्र का जमकर दुरुपयोग किया है।





