नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार देश के राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े संवैधानिक सुधार यानी 'महिला आरक्षण और परिसीमन बिल' को एक बार फिर लोकसभा में पेश करने की तैयारी कर रही है। पिछले गतिरोधों से सबक लेते हुए इस बार बिल को नए सिरे से संशोधित किया जा रहा है। 'इकोनॉमिक्स टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस नए बिल में महिलाओं को 33 प्रतिशत और दलितों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की विशेष व्यवस्था की जा रही है, जो विपक्ष के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन सकता है।
याद दिला दें कि अप्रैल 2026 में लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न होने के कारण यह ऐतिहासिक बिल गिर गया था। चूंकि यह एक संवैधानिक संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित सदस्यों का 2-तिहाई (66.6%) समर्थन अनिवार्य है।
अप्रैल 2026 की वो बाधा: क्यों गिरा था बिल?
संवैधानिक नियमों के तहत लोकसभा में इस बिल को पारित कराने के लिए कम से कम 352 सांसदों के समर्थन की जरूरत थी। लेकिन जब अप्रैल 2026 में वोटिंग हुई, तब:
पक्ष में वोट: 298
विरोध में वोट: 230
परिणाम यह हुआ कि बिल जादुई आंकड़े से 54 वोट दूर रह गया और पारित नहीं हो सका।
मौजूदा संसद का गणित: NDA को कहाँ है जरूरत?
वर्तमान में शिवसेना (UBT) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुई टूट के बाद लोकसभा में NDA के पास 319 सांसद हैं। 352 का आंकड़ा छूने के लिए सरकार को 33 और सांसदों की जरूरत है। वहीं, 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन 208 सांसदों और 2 निर्दलीयों के साथ कुल 210 पर खड़ा है। राज्यसभा में सरकार को सिर्फ 10 अतिरिक्त सांसदों की दरकार है, लेकिन असली परीक्षा लोकसभा में है।
NDA का 'प्लान-4': इन 4 रास्तों से बहुमत जुटाने की रणनीति
रणनीतिकारों के मुताबिक, बीजेपी और एनडीए गठबंधन इस 33 सांसदों की कमी को पूरा करने के लिए चार प्रमुख मोर्चों पर काम कर रहा है:
1. क्षेत्रीय दल और निर्दलीयों का साथ (संख्या - 16): सदन में गैर-गठबंधन वाले 16 सांसद हैं, जिनमें आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) के 4 और 7 निर्दलीय सांसद शामिल हैं। आंध्र के मुख्यमंत्री और एनडीए के प्रमुख सहयोगी चंद्रबाबू नायडू इस बिल को पास कराने के लिए कमान संभाले हुए हैं, जिससे वाईएसआरसीपी और निर्दलीयों का रुख एनडीए के पक्ष में मोड़ा जा सकता है।
2. डीएमके (DMK) पर टिकी नजरें (संख्या - 22): तमिलनाडु की सत्ता गंवाने के बाद से डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में खटास देखी जा रही है। हाल ही में डीएमके ने 'इंडिया' गठबंधन की बैठक का बहिष्कार भी किया था। चूंकि डीएमके पूर्व में वाजपेयी सरकार के दौरान एनडीए का हिस्सा रह चुकी है, इसलिए महिला और दलितों से जुड़े इस संवेदनशील बिल पर सरकार को उनके समर्थन की उम्मीद है।
3. राकांपा (शरद पवार) गुट में संभावित हलचल (संख्या - 08): राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के 8 लोकसभा सांसदों के बीच असंतोष है। यदि इस गुट में कोई राजनीतिक बदलाव होता है, तो एनडीए दो-तिहाई के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच जाएगा।
4. कांग्रेस में 'क्रॉस वोटिंग' या पाला बदल की रणनीति: बीजेपी की नजरें कांग्रेस के असंतुष्ट धड़े पर भी हैं। इतिहास गवाह है कि 2019 में अनुच्छेद-370 हटाने के समय कांग्रेस के राज्यसभा सांसद भुवनेश्वर कलीता ने ऐन मौके पर इस्तीफा देकर कांग्रेस के व्हिप को बेअसर कर दिया था। सरकार इस बार भी विपक्षी खेमे में ऐसी ही सेंधमारी की उम्मीद कर रही है।
क्या है परिसीमन और महिला बिल?
परिसीमन का सीधा अर्थ है—जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की भौगोलिक सीमाओं को दोबारा तय करना। अप्रैल 2026 में पेश किए गए मूल बिल में लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था। हालांकि, नए संशोधित बिल में सीटों की अंतिम संख्या का खुलासा अभी नहीं किया गया है, लेकिन यह साफ है कि आदिवासियों और दलितों के मौजूदा आरक्षण ढांचे से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। सीटों के बढ़ने के बाद ही 33% महिला आरक्षण को जमीन पर उतारा जाएगा।
संपादकीय दृष्टिकोण: महिला और दलित आरक्षण का यह नया कॉम्बो (Combo) विपक्ष के लिए 'निगलें तो पीर, उगलें तो अंधा' वाली स्थिति पैदा कर सकता है। सामाजिक न्याय के इस कार्ड के सामने विपक्ष के लिए सीधे तौर पर विरोध करना आसान नहीं होगा, और यही मोदी सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत हो सकती है।





