नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार द्वारा मांगें मान लिए जाने के बाद दिल्ली का जंतर-मंतर शनिवार को ऐतिहासिक जीत के जश्न का गवाह बना। लेकिन, जैसे ही आंदोलन की सफलता की खबर फैली, महीनों से सड़क पर डटे छात्रों का यह मंच अचानक राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो गया।
देखते ही देखते जंतर-मंतर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और झंडों का जमावड़ा लग गया, जिसके बाद आंदोलन की जीत का 'असली श्रेय' लेने की होड़ शुरू हो गई।
जश्न के बीच राजनीतिक दलों की एंट्री
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की खबर आते ही जंतर-मंतर पर राजनीतिक गतिविधियां अचानक तेज हो गईं। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और आजाद समाज पार्टी समेत कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और समर्थक अपने-अपने झंडों, बैनरों और समर्थकों के साथ मौके पर पहुंच गए।
जो मंच कुछ देर पहले तक छात्रों और युवाओं के नारों से गूंज रहा था, वहां मीडिया कैमरों के सामने नेताओं की मौजूदगी बढ़ गई। नेताओं ने बयानबाज़ी शुरू कर दी और कार्यकर्ता अपने-अपने दल के झंडों के साथ तस्वीरें और वीडियो (रील्स) बनवाते नजर आए।
"कठिन दौर में हम अकेले थे, अब सब श्रेय लेने आ गए": आक्रोशित छात्र
राजनीतिक दलों द्वारा जीत का सेहरा अपने सिर बांधने की कोशिशों से महीनों से संघर्ष कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी देखी गई।
कड़ी धूप और बारिश में झेला दंश: प्रदर्शनकारियों ने बताया कि जब यह आंदोलन अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था—जब उन पर तेज धूप, मूसलाधार बारिश, पुलिस का दबाव और अनिश्चितता का संकट था—तब वे दिन-रात सड़क पर बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के डटे रहे।
रमन (प्रदर्शनकारी छात्र): "इस आंदोलन की शुरुआत CJP और आम छात्रों ने की थी। हफ्तों तक हम बिना किसी राजनीतिक झंडे के अपनी मांगों के लिए लड़ते रहे। जब संघर्ष कठिन था, तब बहुत कम लोग दिखे, लेकिन जीत मिलते ही सब खुद को इस आंदोलन का चेहरा बताने लगे।"
मनोज (प्रदर्शनकारी छात्र): "हमने हफ्तों तक घर का मुंह नहीं देखा, धूप-बारिश झेली। राजनीतिक दलों का नैतिक समर्थन ठीक है, लेकिन पूरे संघर्ष का श्रेय छीनने की कोशिश बिल्कुल अनुचित है। इस जीत के असली हकदार देश के छात्र और आम नागरिक हैं।"
जनता की जीत या सियासत का जरिया?
प्रदर्शनकारी युवाओं का साफ तौर पर मानना है कि सरकार को झुकाने में सबसे बड़ी भूमिका उन हजारों छात्रों, युवाओं और अभिभावकों की एकजुटता की रही, जिन्होंने महीनों तक लगातार धरना दिया और सरकार पर दबाव बनाए रखा। हालांकि, शनिवार को जंतर-मंतर का नजारा यह साबित करने के लिए काफी था कि चुनावी दौर में छात्रों के इस गैर-राजनीतिक पसीने पर सियासत की चमक बिखेरने की होड़ पूरी तरह तेज हो चुकी है।





