भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत में एक बार फिर 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' के दिन लौटने वाले हैं। आगामी 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक ऐसा दांव चला है, जिसने कांग्रेस खेमे की नींद उड़ा दी है। भाजपा द्वारा सोमवार को मध्य प्रदेश मछुआरा कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को अपना तीसरा उम्मीदवार घोषित करते ही राज्य का सियासी पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है।

क्रॉस वोटिंग और टूट के डर से सहमी कांग्रेस अब अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें किसी अन्य कांग्रेस शासित राज्य—संभवतः कर्नाटक—भेजने की गंभीर योजना बना रही है।

देर रात बैठक और बाड़ेबंदी की रणनीति

सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के इस आक्रामक कदम के तुरंत बाद कांग्रेस विधायक दल की एक आपात बैठक विपक्ष के नेता उमंग सिंघार के आवास पर देर रात तक चली। इस बैठक में करीब 60 विधायक शामिल हुए। बैठक का मुख्य एजेंडा विधायकों को मध्य प्रदेश से बाहर ले जाकर एकजुट रखना था, ताकि विपक्ष के किसी भी 'ऑपरेशन' को नाकाम किया जा सके। कांग्रेस ने इस चुनाव के लिए पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार बनाया है।

क्या है सीटों का गणित? क्यों फंसा है पेंच?

मध्य प्रदेश विधानसभा की मौजूदा स्थिति को देखें तो मुकाबला बेहद दिलचस्प और कांटे का हो चुका है। आइए समझते हैं कि आखिर कांग्रेस की चिंता की असली वजह क्या है:

कुल मौजूदा विधायक: 229

जीत के लिए जरूरी जादुई आंकड़ा: राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए उम्मीदवार को पहली पसंद के 58 वोटों की आवश्यकता होगी।

वोटों का दलीय समीकरण:

पार्टीमौजूदा विधायकपहली दो सीटों के लिए जरूरी वोटबची हुई ताकत / कमी
भाजपा (BJP)164116 (तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल के लिए)+48 वोट (जीत के लिए 8 और चाहिए)
कांग्रेस (INC)65 (लगभग)58 (मीनाक्षी नटराजन के लिए)+7 वोट (सैद्धांतिक रूप से सुरक्षित)

टर्निंग पॉइंट: भाजपा के पास अपनी दो सीटें (तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल) आसानी से निकालने के बाद भी 48 अतिरिक्त वोट बच रहे हैं। तीसरी सीट पर महेश केवट को जिताने के लिए भाजपा को केवल 8 और वोटों की दरकार है। यही वो 8 वोट हैं जिन्होंने कांग्रेस के भीतर क्रॉस वोटिंग का खौफ पैदा कर दिया है।

आगे क्या?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा बिना पुख्ता रणनीति के तीसरा उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारती। ऐसे में कांग्रेस फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। यदि विधायकों को कर्नाटक शिफ्ट किया जाता है, तो आगामी 18 जून तक मध्य प्रदेश की राजनीति का रिमोट कंट्रोल बेंगलुरु से चलेगा। अब देखना यह है कि कांग्रेस अपनी साख और विधायकों को बचाने में कितनी कामयाब होती है, या फिर भाजपा का 'तीर' एक बार फिर सही निशाने पर लगता है।