नई दिल्ली:
परीक्षा केंद्रों पर कड़ी निगरानी, 99.5 प्रतिशत सरकारी संस्थान और बायोमेट्रिक अटेंडेंस—तमाम दावों और चाक-चौबंद इंतज़ामों के बावजूद देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET UG 2026 एक बार फिर पेपर लीक की बलि चढ़ गई। 3 मई 2026 को आयोजित इस परीक्षा में करीब 22.7 लाख अभ्यर्थी बैठे थे, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल 'गेस पेपर' के असली प्रश्नपत्र से मेल खाते ही 12 मई को पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी। 21 जून को पुनरपरीक्षा तो हुई, लेकिन लाखों छात्रों और अभिभावकों के भरोसे को जो ठेस पहुंची, उसकी भरपाई नामुमकिन है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार के पास इस तरह के संकट से बचने का पूरा ब्लूप्रिंट पिछले दो सालों से मौजूद था, फिर भी इसे लागू नहीं किया गया।
दो साल पहले मिला था 'सुरक्षा कवच'
NEET 2024 के विवाद के बाद 22 जून 2024 को शिक्षा मंत्रालय ने पूर्व इसरो (ISRO) प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। 37 हजार से अधिक सुझावों, 23 गहन बैठकों और देश भर के प्रमुख संस्थानों की केस स्टडी के बाद 21 अक्टूबर 2024 को 184 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी गई।
कमेटी ने 'मिशन मोड' में लागू करने के लिए 101 ठोस सिफारिशें दी थीं। इनमें से कई प्रावधानों को 2025 से ही लागू करने की बात कही गई थी।
लीक की सबसे कमजोर कड़ी और 'स्मार्ट' इलाज
राधाकृष्णन समिति ने बहुत स्पष्ट शब्दों में आगाह किया था कि पेन-पेपर आधारित परीक्षा में सबसे बड़ा जोखिम प्रिंटिंग प्रेस से लेकर ट्रांसपोर्टेशन और स्टोरेज तक होता है।
राधाकृष्णन कमेटी का समाधान: 'कंप्यूटर असिस्टेड सिक्योर पेपर बेस्ड टेस्टिंग'—इस मॉडल के तहत पेपर पहले से छपकर देश भर में नहीं घूमते। प्रश्नपत्र एन्क्रिप्टेड कोड में सीधे परीक्षा केंद्र के सुरक्षित सर्वर पर भेजे जाते हैं और परीक्षा शुरू होने से कुछ समय पहले हाई-स्पीड प्रिंटर से प्रिंट होकर सीधे परीक्षार्थियों तक पहुंचते हैं।
कमेटी ने इस मॉडल का पायलट टेस्ट करने की सिफारिश की थी। लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि दो साल बीत जाने के बाद भी इसका पायलट टेस्ट क्यों नहीं हुआ?
10 प्रमुख सिफारिशें, जो कागजों से बाहर न आ सकीं
डिजिटल ट्रांसफर व ऑन-साइट प्रिंटिंग: प्रश्नपत्र कोड के रूप में केंद्रों तक पहुंचे और वहीं प्रिंट हो।
प्रिंटिंग प्रेस में सख्त सुरक्षा: कर्मचारियों की बॉडी स्कैनिंग, नो-मोबाइल जोन और CCTV फुटेज का एक साल तक रिकॉर्ड।
एंड-टू-एंड ट्रैकिंग: जीपीएस (GPS) से लैस गाड़ियां, सीलबंद पेटियां और चुनाव जैसी पारदर्शी व्यवस्था।
स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही: DM और SP की निगरानी में केंद्र की जांच व सुरक्षा।
स्मार्ट सेंटर सिलेक्शन: केंद्रों का आवंटन कंप्यूटर द्वारा हो, दागदार संस्थान सूची से बाहर रहें।
होम डिस्ट्रिक्ट और एनामली डिटेक्शन: छात्र को अपना जिला मिले और संदिग्ध केंद्रों का चयन पहले ही पकड़ा जाए।
चरणबद्ध परीक्षा: अभ्यर्थियों की संख्या 2 लाख से अधिक होने पर परीक्षा कई दिनों में आयोजित हो।
डायनामिक पेपर सेट्स: ए, बी, सी से अलग जटिल सेट कोड्स और प्रश्नों का बदला हुआ क्रम।
विकेंद्रीकृत ठेका: पूरी परीक्षा व्यवस्था का दायित्व किसी एक निजी एजेंसी के पास न हो।
मासिक मॉनिटरिंग: सिफारिशों पर अमल की निगरानी के लिए मासिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
"NTA ने कोई सबक नहीं सीखा" - सुप्रीम कोर्ट
NEET 2026 के रद्द होने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इस स्थिति को 'अत्यंत दर्दनाक' करार दिया। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने अतीत से कोई सबक नहीं लिया है और जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होगी, यह सिलसिला थमेगा नहीं।
जमीनी हकीकत बनाम सरकारी दावों का गणित
राजस्थान पुलिस की SOG और CBI की जांच में महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान तक फैले एक मल्टी-स्टेट सिंडिकेट की संलिप्तता सामने आई है। जांच ने साफ कर दिया कि लीक परीक्षा केंद्रों पर नहीं, बल्कि सीधे प्रिंटिंग प्रेस से हुआ—ठीक वही जगह, जिसे कमेटी ने सबसे असुरक्षित बताया था।
शिक्षा मंत्रालय का तर्क है कि जिला स्तरीय समन्वय समितियां बनाई गईं और स्टीयरिंग कमेटी का गठन हुआ। शिक्षा मंत्री के अनुसार, सिफारिशें लागू की गईं लेकिन "कमांड चेन में ब्रेक" आ गया। हालांकि, सरकार यह स्पष्ट करने में विफल रही है कि 101 सिफारिशों में से वास्तव में कितनी लागू हुईं और सबसे महत्वपूर्ण 'ऑन-साइट प्रिंटिंग' मॉडल को क्यों अटकाया गया।
बड़ा सवाल: आखिर जवाबदेही किसकी?
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और बयानों के बीच असली मुद्दा भटक जाता है। जब देश की शीर्ष विशेषज्ञ समिति ने समस्या का सटीक समाधान दो साल पहले ही सरकार की मेज पर रख दिया था, तो उसे लागू करने में टालमटोल क्यों हुई?
आज जब करोड़ों युवा एक पारदर्शी और भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली की उम्मीद में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, तब इस गंभीर चूक की जिम्मेदारी तय करना बेहद जरूरी हो गया है।





