कोलकाता / नई दिल्ली:

भारतीय राजनीति में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल है। कुछ दिनों पहले तक जिस राजनीतिक दल का नाम शायद ही किसी ने सुना था, आज वह देश के सबसे बड़े सियासी उलटफेर के केंद्र में आ गया है। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी है। इस ऐतिहासिक दलबदल ने न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक गहरा संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि एक बिल्कुल अनजान पार्टी को रातों-रात भारतीय संसद और राष्ट्रीय राजनीति का एक अहम खिलाड़ी बना दिया है।

त्रिपुरा के चुनावी मैदान से सीधे संसद का सफर

NCPI की शुरुआत बेहद सामान्य रही है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के रिकॉर्ड के अनुसार:

पंजीकरण: पार्टी को त्रिपुरा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 20 जनवरी, 2023 को एक 'रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी' (RUPP) के रूप में रजिस्टर किया गया था।

चुनावी खाता: बंगाल में रजिस्टर्ड होने के बावजूद इस पार्टी ने त्रिपुरा चुनाव में किस्मत आजमाई। कुल 7 सीटों पर पर्चा भरा गया, जिनमें से 4 पर नामांकन खारिज हो गए। अंततः दो सीटों पर चुनाव लड़कर पार्टी को कुल महज 822 वोट नसीब हुए थे।

फंडिंग: चुनाव आयोग के दस्तावेजों के मुताबिक, इस पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 1.13 लाख रुपये का चंदा मिला था।

हावड़ा का एक पता और शुभेंदु अधिकारी के साथ कनेक्शन

इस गुमनाम पार्टी के अचानक राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद इसके ढांचे और नेतृत्व को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है।

नेतृत्व: पार्टी के अध्यक्ष उत्तिया कुंडू हैं और उनकी पत्नी शेवली कुंडू इस दल की कोषाध्यक्ष हैं।

रजिस्टर्ड पता: पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर इलाके में एक ही पते पर रजिस्टर्ड है, जहां शेवली कुंडू द्वारा संचालित दो अन्य संस्थाएं (बिस्वबाजार प्राइवेट लिमिटेड और पश्चिम बंगाल असंगठित महिला कर्मी एसोसिएशन) भी काम करती हैं।

सियासी कयास: पार्टी अध्यक्ष उत्तिया कुंडू की पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ सोशल मीडिया पर एक तस्वीर सामने आने के बाद इस पूरे घटनाक्रम के पीछे के राजनीतिक समीकरणों को लेकर कयासों का बाजार गर्म हो गया है।

त्रिपुरा चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार रहे जहांगीर अली का कहना है कि चुनाव के बाद पार्टी अचानक गायब हो गई थी और कोलकाता से आईं शेवली कुंडू से उनका संपर्क टूट गया था। धन की कमी के कारण पार्टी नेता शांतनु डे द्वारा 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारी का प्रस्ताव भी ठप पड़ गया था। लेकिन अब इस विलय ने पार्टी को पुनर्जीवन दे दिया है।

एंटी-डिफेक्शन लॉ से बचने की रणनीति?

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के लगभग दो-तिहाई (2/3) सांसदों का यह बागी गुट अब पूरी तरह से NCPI के साथ आ गया है। इस बगावत के तुरंत बाद बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर संसद में बैठने की अलग व्यवस्था करने की मांग की।

बैठक के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने स्पष्ट किया:

"हमने संसद में एक अलग समूह के तौर पर मान्यता पाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को औपचारिक पत्र सौंप दिया है।"

दूसरी ओर, इस टूट से हैरान तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि बागी गुट अब NCPI में शामिल हो चुका है, जिसे उन्होंने एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी बताया।

NCPI: एक नज़र में राजनीतिक प्रोफ़ाइल

विवरणतथ्य और आंकड़े
स्थापना/पंजीकरण20 जनवरी, 2023 (RUPP के तौर पर)
पार्टी अध्यक्षउत्तिया कुंडू
कुल चुनावी चंदा (2023)₹1.13 लाख
त्रिपुरा चुनाव 2023 का प्रदर्शनकुल 2 सीटों पर केवल 822 वोट
ताजा राजनीतिक हैसियतसंसद में 20 बागी सांसदों का समर्थन

जो पार्टी कुछ समय पहले तक अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी और वित्तीय संसाधनों की कमी से जूझ रही थी, आज लोकसभा के भीतर एक नए और मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में उभर आई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विलय बंगाल और देश की राजनीति को किस करवट लेकर जाता है।