कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही एक बार फिर 'वर्चस्व की जंग' तेज हो गई है। बंगाल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है— 'जोर जार, मुलुक तार' (जिसकी लाठी, उसकी भैंस)। दुर्भाग्य से, यह कहावत यहाँ के चुनावी लोकतन्त्र का कड़वा सच बन चुकी है। दशकों से चली आ रही राजनीतिक हिंसा, बदलती डेमोग्राफी और तीव्र ध्रुवीकरण ने आगामी चुनावों को बेहद संवेदनशील बना दिया है।

हिंसा की 'पॉलिटिकल लीगेसी'

बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई घटना नहीं है, बल्कि यह एक 'राजनीतिक विरासत' बन चुकी है। कांग्रेस के दौर से शुरू हुआ यह सिलसिला वाममोर्चा के 34 साल के शासन से होता हुआ तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों के कार्यकाल तक बदस्तूर जारी है। विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहने की छटपटाहट और विपक्ष का आक्रामक पलटवार इस टकराव को जन्म देता है।

चुनावी हिंसा के काले आँकड़े:

2023 (पंचायत चुनाव): 45 से अधिक मौतें।

2021 (विधानसभा चुनाव): करीब 40 लोगों की जान गई।

2018 (पंचायत चुनाव): 23 लोगों की हत्या।

2019 (लोकसभा चुनाव): 11 लोगों की मौतें।

सबसे संवेदनशील: पंचायत और ग्रामीण क्षेत्र

बंगाल की आत्मा इसके गाँवों में बसती है, और यही कारण है कि सबसे भीषण हिंसा पंचायत चुनावों में देखी जाती है। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिले इतने संवेदनशील हैं कि चुनाव का नाम सुनते ही आम नागरिक सिहर उठते हैं। इस बार चुनाव से ठीक पहले भारी मात्रा में बम और अवैध हथियारों की बरामदगी ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है।

सुरक्षा का अभेद्य किला: 2500 कंपनियों का पहरा

निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना चुनाव आयोग के लिए हिमालय जैसी चुनौती है। इसे देखते हुए इस बार सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए जा रहे हैं:

ऐतिहासिक तैनाती: बंगाल में 2,000 से 2,500 केंद्रीय सुरक्षा बलों (CAPF) की कंपनियों की निगरानी में मतदान कराया जाएगा।

इंटीग्रेटेड कंट्रोल रूम: मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) कार्यालय और जिला स्तर पर एकीकृत नियंत्रण कक्ष बनाए जाएंगे ताकि केंद्रीय बलों के मूवमेंट पर सीधी नजर रखी जा सके।

मौजूदा स्थिति: वर्तमान में राज्य के विभिन्न हिस्सों में केंद्रीय बलों की 480 कंपनियां पहले ही फ्लैग मार्च कर रही हैं।

चुनौतियां और आरोप

विपक्ष अक्सर आरोप लगाता रहा है कि राज्य प्रशासन जानबूझकर केंद्रीय बलों के इस्तेमाल को शिथिल कर देता है ताकि 'बूथ कैप्चरिंग' और 'वोट लूट' को अंजाम दिया जा सके। अपहरण, बमबाजी, पोलिंग एजेंटों की पिटाई और उम्मीदवारों को धमकी देना यहाँ के चुनावी परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं।

हालाँकि, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात जैसे राज्यों ने समय के साथ चुनावी हिंसा पर काफी हद तक काबू पाया है, लेकिन बंगाल में यह चुनौती आज भी जस की तस खड़ी है।