कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'संवैधानिक मर्यादा' की बहस एक बार फिर गरमा गई है। टीएमसी नेता ब्रत्य बसु ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोलते हुए उनकी तुलना एडोल्फ हिटलर के कुख्यात प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स से कर दी। बसु का यह बयान आयोग द्वारा राज्य के शीर्ष अधिकारियों के ताबड़तोड़ तबादलों के बाद आया है।

क्या है 'गोएबल्स' उपमा का अर्थ?

ब्रत्य बसु द्वारा इस्तेमाल किया गया 'गोएबल्स' शब्द कूटनीतिक और ऐतिहासिक रूप से बेहद गंभीर माना जाता है।

जोसेफ गोएबल्स: यह नाजी जर्मनी का प्रोपेगेंडा मंत्री था, जिसकी थ्योरी थी— "अगर एक झूठ को बार-बार और जोर-शोर से बोला जाए, तो लोग उसे सच मान लेते हैं।" बसु का आरोप है कि चुनाव आयोग भी इसी तर्ज पर बंगाल की जनता को गुमराह कर रहा है और एक संवैधानिक संस्था के बजाय राजनीतिक उपकरण की तरह व्यवहार कर रहा है।

तबादलों की 'सर्जिकल स्ट्राइक' पर फूटा गुस्सा

ब्रत्य बसु की नाराजगी का मुख्य कारण पिछले 72 घंटों में आयोग द्वारा लिए गए कड़े फैसले हैं:

शीर्ष अधिकारियों का हटाना: आयोग ने बंगाल के मुख्य सचिव (CS), डीजीपी (DGP) और कई जिलों के जिलाधिकारियों (DM) का अचानक तबादला कर दिया है।

टीएमसी का आरोप: बसु ने दावा किया कि ये तबादले उन लोगों के इशारे पर हो रहे हैं जिन्हें टीएमसी 'गद्दार' (शुभेंदु अधिकारी की ओर इशारा) मानती है, ताकि बीजेपी को चुनावी फायदा पहुंचाया जा सके।

नेताओं के साथ दुर्व्यवहार का दावा

मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि जब टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल अपनी शिकायतें लेकर आयोग के पास जाता है, तो वरिष्ठ अधिकारी उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करते हैं। उन्होंने इसे बंगाल और तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ 'युद्ध का ऐलान' करार दिया।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और संभावित कार्रवाई

बीजेपी का पलटवार: प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कहा कि हार के डर से टीएमसी मानसिक संतुलन खो चुकी है और संवैधानिक संस्थाओं का अपमान करना बंगाल की संस्कृति नहीं है।

चुनाव आयोग का रुख: सूत्रों के अनुसार, आयोग इस 'व्यक्तिगत हमले' का संज्ञान ले सकता है। यदि इसे संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला माना गया, तो ब्रत्य बसु के चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों की राय: विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी जानबूझकर 'विक्टिम कार्ड' खेल रही है ताकि मतदाताओं को यह संदेश दिया जा सके कि दिल्ली की संस्थाएं बंगाल के साथ भेदभाव कर रही हैं।

निष्कर्ष

23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान से पहले यह तीखी बयानबाजी संकेत दे रही है कि 2026 का बंगाल चुनाव केवल ईवीएम (EVM) पर नहीं, बल्कि 'अस्मिता' और 'संवैधानिक स्वायत्तता' के नारों पर भी लड़ा जाएगा।