नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने टाटा समूह के भीतर चल रहे नेतृत्व विवाद को लेकर गंभीर और कड़े आरोप लगाए हैं। उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया के जरिए दावा किया कि देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह—टाटा समूह को “आपराधिक तरीके से बर्बाद” किया जा रहा है। साथ ही, उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम पर देश के बिजनेस लीडर्स (उद्योग जगत के दिग्गजों) की चुप्पी पर भी तीखे सवाल खड़े किए हैं और कसम खाई है कि वे इन अपराधों के लिए न्याय दिलाकर रहेंगे।

यह पहला मौका है जब कांग्रेस पार्टी की ओर से टाटा समूह के आंतरिक गतिरोध और नेतृत्व की इस लड़ाई पर खुलकर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। इस विवाद के कारण टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्डरूम के बीच मतभेद सतह पर आ गए हैं।

राहुल गांधी का तीखा सोशल मीडिया पोस्ट

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक आक्रामक पोस्ट शेयर करते हुए लिखा:

‘टाटा को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है और किसी भी बिजनेस लीडर में एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं है। आप कब तक चुप रहेंगे? क्या तब तक, जब तक वे आप पर पूरी तरह कब्जा न कर लें? भारतीय कारोबार मोदी और शाह के खिलौने नहीं हैं। आपमें हिम्मत की कमी है… हममें नहीं है… हम इन अपराधों के लिए न्याय दिलाकर रहेंगे।’

क्या है टाटा समूह का ताजा नेतृत्व विवाद?

यह पूरा विवाद टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव को लेकर शुरू हुआ है।

  • नोएल टाटा की आपत्ति: इस हफ्ते की शुरुआत में, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने एन. चंद्रशेखरन की पुनः नियुक्ति के प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से चुनौती दी। यह प्रस्ताव देश की सबसे बड़ी कारोबारी होल्डिंग कंपनी टाटा संस की 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में पारित किया गया था। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। नोएल टाटा ने इस नियुक्ति के फैसले को गैर-कानूनी करार देते हुए अपने वीटो (निषेधाधिकार) अधिकारों का इस्तेमाल किया है।
  • पत्र और वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग: मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 26 अक्टूबर को टाटा संस के कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय को लिखे एक पत्र में नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि री-अपॉइंटमेंट का यह विषय बैठक से पहले जारी किए गए आधिकारिक एजेंडे में शामिल ही नहीं था। इसके साथ ही उन्होंने बैठक की कार्यवाही की बिना एडिट की गई वीडियो रिकॉर्डिंग भी मांगी है।

बोर्ड बैठक में मतभेद और कानूनी राय

17 सितंबर की बोर्ड बैठक में स्थिति काफी विभाजित रही:

  • समर्थन और विरोध: चार डायरेक्टर्स ने एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट किया। टाटा ट्रस्ट्स के एक अन्य नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में सहमति जताई।
  • आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन पर खींचतान: टाटा ट्रस्ट्स का दावा है कि कंपनी की नियमावली (आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन) के अनुसार, ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों के लिए उनके नॉमिनी डायरेक्टर्स की बहुमत से मंजूरी अनिवार्य है।
  • कानूनी सलाह: दूसरी ओर, टाटा संस इस व्याख्या को खारिज करता है। कंपनी ने देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) यूयू ललित और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बीएन श्रीकृष्ण की कानूनी राय का हवाला दिया है, जिसके मुताबिक यह प्रस्ताव पूरी तरह वैध है।

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चंद्रशेखरन के रुख में बदलाव

इस विवाद की पृष्ठभूमि में एन. चंद्रशेखरन का रुख भी चर्चा का विषय रहा है:

  • टाटा संस के अनुसार, जुलाई 2025 में सभी ट्रस्टों ने एकमत होकर चंद्रशेखरन को एक और कार्यकाल देने का समर्थन किया था।
  • हालांकि, फरवरी 2026 में बोर्ड इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं ले पाया क्योंकि सदस्यों में आम सहमति नहीं थी।
  • इसके बाद, 12 अगस्त को चंद्रशेखरन ने बोर्ड को सूचित किया था कि फरवरी 2027 में अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद वे इस पद पर बने रहने की मांग नहीं करेंगे।
  • इसके बाद बोर्ड की नॉमिनेशन और रेम्यूनरेशन कमेटी ने उन्हें एक और कार्यकाल देने की सिफारिश की, जिसके बाद चंद्रशेखरन ने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया और 17 सितंबर को इस पर वोटिंग कराई गई।

अब राहुल गांधी के इस बयान के बाद टाटा समूह का यह अंदरूनी कॉर्पोरेट और पारिवारिक विवाद राजनीतिक गलियारों में भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

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