नई दिल्ली:दिल्ली में ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रोटेस्ट के बाद ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा 10,000 रुपये का पर्सनल शांति बॉन्ड भरने के नोटिस के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को तीखी और लंबी बहस हुई। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस हाई-प्रोफाइल मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

कोर्ट रूम की मुख्य बहस और वकीलों के तर्क

  • नेहा बोरा का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि नेहा का प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और उन्हें बिना किसी वैध आधार के हिरासत में लिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि SEM (विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट) ने बिना किसी प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) के और बिना सोचे-समझे (Mechanically) यह नोटिस जारी कर दिया।
  • दिल्ली पुलिस का पक्ष: दिल्ली सरकार और पुलिस का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने याचिका की मेंटेनेबिलिटी (पोषणीयता) पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि नेहा बोरा पर पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन्होंने विरोध प्रदर्शन के दौरान 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) जैसे भड़काऊ बयान दिए थे। ASG ने कहा कि इस तरह के मामलों में कानून के तहत एहतियाती कदम उठाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

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दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने दिल्ली पुलिस और मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) पर जोर: कोर्ट ने कहा कि जब किसी नागरिक की पर्सनल लिबर्टी दांव पर हो, तो कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन होना चाहिए। बिना किसी निष्पक्ष जांच के किसी व्यक्ति को 'बैड बॉय' (अपराधी प्रवृत्ति का) करार देकर इस तरह बॉन्ड भरने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
  • प्रिवेंटिव डिटेंशन पर सवाल: अदालत ने यह भी तंज कसा कि जांच पूरी होने से पहले ही इस तरह के नोटिस थमाना और अच्छे आचरण का वादा करने के लिए कहना अपने आप में एक 'स्टिग्मा' (कलंक) की तरह है, जो न्यायसंगत प्रक्रिया के खिलाफ है।

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