विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली:

देश के संसदीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। केंद्र सरकार इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुला सकती है, जिसमें लोकसभा सीटों के विस्तार और नए परिसीमन की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय लिए जाने की संभावना है। सत्र के दौरान संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन (संशोधन) बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल पारित कराए जाने की योजना है।

गौरतलब है कि लगभग छह महीने पहले भी सरकार ने यह बिल पेश किया था, लेकिन आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के अभाव में यह पारित नहीं हो सका था। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने अब आवश्यक रणनीतिक समर्थन जुटा लिया है, जिससे इस बार बिल के आसानी से पारित होने के कयास लगाए जा रहे हैं।

50% वृद्धि मॉडल: 816 से 850 सांसदों का प्रस्तावित ढांचा

फिलहाल लोकसभा में 543 निर्वाचित सांसद हैं। यदि सरकार के प्रस्तावित 50% बढ़ोतरी वाले मॉडल को लागू किया जाता है, तो सांसदों की संख्या बढ़कर करीब 816 हो जाएगी। संसद में अधिकतम 850 सीटों की सीमा तय करने का प्रस्ताव है।

50% वृद्धि वाले फॉर्मूले के तहत प्रमुख राज्यों की सीटों का अनुमानित गणित इस प्रकार होगा:

राज्यवर्तमान सीटेंप्रस्तावित/अनुमानित सीटें
उत्तर प्रदेश80120
महाराष्ट्र4872
पश्चिम बंगाल4263
बिहार4060
तमिलनाडु3959
मध्य प्रदेश2944
कर्नाटक2842
राजस्थान2538

इसके अलावा अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी सीटों का अनुपात इसी तर्ज पर बढ़ाने की योजना है।

प्रति सांसद आबादी: भारत और विश्व का तुलनात्मक ढांचा

वर्तमान में भारत की लगभग 140 करोड़ की आबादी पर 543 सांसद हैं, यानी प्रति सांसद औसतन 25.78 लाख लोग आते हैं। यदि 850 सांसदों का नया परिसीमन लागू होता है, तो यह आंकड़ा घटकर लगभग 16.47 लाख प्रति सांसद हो जाएगा।

विश्व के अन्य प्रमुख लोकतंत्रों की तुलना में भारत में सांसदों पर आबादी का बोझ अत्यधिक रहा है:

  • अमेरिका: प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) का 1 सदस्य = ~7.8 लाख नागरिक
  • ब्रिटेन: 1 सांसद = ~1.07 लाख नागरिक
  • फ्रांस: 1 सांसद = ~1.15 लाख नागरिक

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उत्तर बनाम दक्षिण: परिसीमन पर विवाद और जनसंख्या का संतुलन

परिसीमन का मूल नियम यह है कि सीटों का आवंटन जनसंख्या के अनुपात में हो। 1970 के दशक में जब केंद्र सरकार ने परिवार नियोजन अभियान चलाया, तब दक्षिण भारत के राज्यों ने इसे प्रभावी ढंग से लागू किया और अपनी जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाया। इसके विपरीत, उत्तर भारत के राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ती रही।

यदि केवल शुद्ध आबादी के आधार पर परिसीमन होता, तो दक्षिण भारत के राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण की 'सजा' के रूप में संसद में कम सीटें मिलतीं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को सीटें ज्यादा मिल जातीं। इस विवाद को टालने के लिए:

  1. 1977 का संशोधन: 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या 2001 तक के लिए फ्रीज कर दी गई।
  2. 2002 (अटल बिहारी वाजपेयी सरकार): इस रोक को बढ़ाकर वर्ष 2026 तक कर दिया गया।

क्या दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व घटेगा?

विपक्ष की मुख्य चिंता यही रही है कि उत्तर भारत की आबादी अधिक होने से दक्षिण का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा। हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, 50% वृद्धि वाले मॉडल से दक्षिण भारत के 5 प्रमुख राज्यों (तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल) की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी। इससे कुल सीटों में दक्षिण का हिस्सा करीब 24% पर सुरक्षित बना रहेगा।

50% वृद्धि के बावजूद प्रति सांसद आबादी में अंतर क्यों?

2026 के जनसंख्या अनुमानों के अनुसार, 50% सीटें बढ़ाने के बाद भी हर राज्य में एक सांसद के हिस्से आने वाली आबादी समान नहीं होगी:

  • उत्तर प्रदेश (~24.29 करोड़ आबादी / 120 सीटें): प्रति सांसद ~20.24 लाख लोग
  • बिहार (~13.23 करोड़ आबादी / 60 सीटें): प्रति सांसद ~22.05 लाख लोग
  • कर्नाटक (~6.8 करोड़ आबादी / 42 सीटें): प्रति सांसद ~16.19 लाख लोग
  • पश्चिम बंगाल (~10.2 करोड़ आबादी / 63 सीटें): प्रति सांसद ~16.19 लाख लोग
  • तमिलनाडु (~7.7 करोड़ आबादी / 59 सीटें): प्रति सांसद ~13.05 लाख लोग

यह अंतर स्पष्ट करता है कि समान प्रतिशत वृद्धि के बावजूद राज्यवार प्रजनन दर और जनसंख्या वृद्धि दर अलग-अलग रहने के कारण प्रति सांसद जन-प्रतिनिधित्व में भिन्नता बनी रहेगी।

राजनीतिक सहमति और आगे की राह

छह महीने पूर्व जब यह विधेयक लाया गया था, तब विपक्षी दलों ने मांग की थी कि 50% वृद्धि के फॉर्मूले की लिखित संवैधानिक गारंटी दी जाए। सूत्रों के संकेत बताते हैं कि सरकार इस बार विपक्षी दलों (विशेषकर सपा, डीएमके व अन्य) की इस मांग को नए बिल के प्रारूप में शामिल कर सकती है।

संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, परिसीमन का कार्य स्वतंत्र 'परिसीमन आयोग' (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है। बिल पास होने के बाद, आधिकारिक जनगणना के आंकड़े और परिसीमन आयोग की कानूनी प्रक्रिया ही अंतिम सीटों की संख्या और भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करेगी।

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