पश्चिम बंगाल में हुए विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे ने एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है। हलफनामे में चुनाव आयोग ने स्वीकार किया है कि राज्य में 16 लाख से अधिक वोटरों के खिलाफ उसके अपने ही अधिकारियों द्वारा दाखिल की गई अपीलों की जानकारी आयोग के शीर्ष नेतृत्व को नहीं थी। हालांकि, इसके बावजूद आयोग ने इस प्रक्रिया को अवैध या गलत मानने से इनकार किया है।
सुप्रीम कोर्ट के हलफनामे से सामने आईं 3 मुख्य बातें
- शीर्ष नेतृत्व और चुनाव आयुक्तों को नहीं थी खबर:
- अंग्रेजी अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त एस. एस. संधु ने एक आपत्ति पत्र जारी करते हुए यह बात रेखांकित की थी कि अधिकारियों द्वारा अपील दायर करने के संबंध में न तो दोनों चुनाव आयुक्तों को सूचित किया गया था और न ही राज्य चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारी इससे अवगत थे। बैठक में पूछे जाने पर भी इस संबंध में कोई स्पष्टता नहीं दी गई थी।
- अंतिम समय में आयोग को हुई जानकारी:
- आयोग ने हलफनामे में कहा कि उसे खुद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से महज 4 दिन पहले यह पता चला कि राज्य चुनाव अधिकारियों ने 16.1 लाख वोटरों के नाम काटने/अपील करने की कार्रवाई की है। आयोग का तर्क है कि भले ही जानकारी देर से मिली, लेकिन यह कदम सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप था और इसमें कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं है।
- 38 लाख वोटरों का पेच आया सामने:
- एसआईआर के दौरान प्रभावित हुए कुल 38 लाख वोटरों का आंकड़ा अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद पूरी तरह स्पष्ट हुआ है। इनमें से 22 लाख वे लोग थे जिनके नाम कट चुके थे और वे पुनर्भुगतान या नाम वापस जोड़ने की मांग कर रहे थे, जबकि 16 लाख ऐसे मामले थे जिनके खिलाफ नाम हटाने के लिए खुद प्रशासनिक अधिकारियों ने ही अपील दाखिल की थी।
तृणमूल कांग्रेस का हमला: 'अंधेरे में रखकर हुआ खेल'
इस खुलासे के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की वरिष्ठ नेता और सांसद महुआ मोइत्रा ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है।
- अधिकारियों की भूमिका पर सवाल: महुआ मोइत्रा का आरोप है कि तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने शीर्ष अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अंधेरे में रखकर यह कार्रवाई की।
- हार-जीत के आंकड़ों का गणित: तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि बंगाल चुनाव में 38 लाख वोटरों के नाम एसआईआर के पेच में फंसने से सीधा असर जनादेश पर पड़ा। टीएमसी का कहना है कि चुनाव में पार्टी को 2 करोड़ 60 लाख वोट मिले, जबकि प्रतिद्वंद्वी पार्टी को 2 करोड़ 90 लाख वोट प्राप्त हुए (30 लाख वोटों का अंतर)। टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट को ऐसी 30 विधानसभा सीटों की सूची भी सौंपी है, जहां एसआईआर का सीधा असर परिणाम पर पड़ने का दावा किया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?
यह मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है:
- अदालत की सख्त टिप्पणी: सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मामले की गहराई से जांच की बात कही है। इससे पहले न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूइयां भी टिप्पणी कर चुके हैं कि यदि यह साबित होता है कि एसआईआर में गड़बड़ी के कारण किसी प्रत्याशी की हार हुई है, तो अदालत कठोर कदम उठाएगी।
- ट्रिब्यूनल के फैसले और भावी राह: वर्तमान में नाम कटने से प्रभावित लोगों के मामले ट्रिब्यूनल में लंबित हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, ट्रिब्यूनल अब तक 1 लाख मामलों का निपटारा कर चुका है, जिनमें से 93 प्रतिशत फैसले वोटरों के पक्ष में आए हैं।
- वरिष्ठ वकीलों की मांग: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया है कि 93% सफलता दर को देखते हुए एसआईआर के दौरान काटे गए सभी पात्र वोटरों के नाम तुरंत मतदाता सूची में पुनः जोड़े जाने चाहिए।
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