नई दिल्ली / वाशिंगटन
प्रशांत महासागर में आकार ले रहा 'सुपर अल नीनो' (Super El Niño) पूरी दुनिया के लिए एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपातकाल बनता जा रहा है। 'क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब' (Climate Impact Lab) द्वारा जारी एक नए वैश्विक नक्शे और 'अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर' के आंकड़ों ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।
नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 से मार्च 2027 के नौ महीनों के दौरान भीषण गर्मी और उससे जुड़ी जटिलताओं के कारण वैश्विक स्तर पर 8,57,400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह आंकड़ा वैज्ञानिकों द्वारा महज एक महीने पहले लगाए गए अनुमान से 3,50,000 अधिक है।
पूर्वी-मध्य प्रशांत में पारा सामान्य से 3.4°C ऊपर
सुपर अल नीनो का यह रूप तब सामने आया है जब पूर्वी-मध्य प्रशांत महासागर के 'नीनो 3.4' क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3.4 डिग्री सेल्सियस (6 डिग्री फारेनहाइट से अधिक) ऊपर दर्ज किया गया है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के चेतावनी भरे आकलन के अनुसार, नवंबर से जनवरी के बीच यह घटना वैश्विक तापमान को एक सामान्य अल नीनो की तुलना में छह गुना से भी अधिक बढ़ा सकती है।
देशवार आंकड़े: नाइजीरिया और भारत सबसे ज्यादा प्रभावित
दुनियाभर के लगभग 3,700 क्षेत्रों के डेटा का विश्लेषण करने वाली इस रिसर्च के अनुसार, कुल अतिरिक्त मौतों में से आधी से अधिक आगामी महीनों में देखने को मिलेंगी:
| देश | संभावित अतिरिक्त मौतें (जून 2026 - मार्च 2027) | प्रमुख जोखिम और प्रभाव |
| नाइजीरिया | 56,000+ | भीषण हीटवेव और जल संकट |
| भारत | 55,200 | मानसूनी बारिश में कमी, खाद्य और स्वास्थ्य संकट |
| इंडोनेशिया | 29,300 | जंगलों में भीषण आग (Forest Fires) और सूखा |
| ब्राजील | 19,500 | अमेज़न बेसिन में सूखा और अत्यधिक गर्मी |
| सूडान | 14,700 | खाद्य असुरक्षा और मानवीय संकट |
अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 का आंकड़ा: इस छह महीने की अवधि में ही 3,73,000 से अधिक मौतों का अनुमान है, जिसमें से एक-तिहाई से अधिक मौतें केवल नाइजीरिया, भारत और ब्राजील में केंद्रित होंगी।
पहले ही दिख चुका है अल नीनो का विनाशकारी रूप
शोधकर्ताओं के अनुसार, जून से अब तक अल नीनो के कारण दुनिया भर में लगभग 4,84,500 अतिरिक्त मौतें हो चुकी हैं। इसके प्रभाव पहले ही विभिन्न रूपों में दर्ज किए गए हैं:
- भारत: महत्वपूर्ण मानसूनी वर्षा में रुकावट और अत्यधिक गर्मी।
- इंडोनेशिया: जंगलों में भयानक आग का फैलना।
- मध्य अमेरिका: खेती और जल स्रोतों को प्रभावित करने वाला भीषण सूखा।
- अमेरिका: पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में असाधारण तूफानों और बारिश का जोखिम।
वैज्ञानिकों की चेतावनी और नीतिगत कदम
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक माइकल ग्रीनस्टोन ने इस रिपोर्ट पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा:
"अत्यधिक गर्मी के जानलेवा प्रभावों का पहले से सटीक अनुमान लगा पाना एक ऐतिहासिक कदम है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि हम जान सकते हैं कि कहाँ लोग सबसे ज्यादा खतरे में हैं। इससे नीति-निर्माताओं को लोगों की जान जाने से पहले ही ठोस आपातकालीन कदम उठाने का अवसर मिलता है।"
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों को तत्काल स्वास्थ्य सेवाओं, कूलिंग सेंटरों के निर्माण, जल प्रबंधन और कृषि सुरक्षा रणनीतियों को मजबूत करना होगा ताकि इस आपदा के प्रभाव को कम किया जा सके।
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