लखनऊ। कल्याण सिंह ये ऐसा नाम है जो शायद किसी ने सुना हो। 1962 से लेकर 8 सितंबर 2019 तक के सफर में कई उतार चढ़ाव देखे और यही तो राजनीतिक दंगल के एक मंझे हुए खिलाड़ी की पहचान होती है।अपनी काबलियत पर यूपी ही नही बल्कि पूरे भारत वर्ष में अपनी पहचान कल्याण सिंह जी ने बनाई थी।अपने महान व्यक्तिव के धनी कल्याण सिंह जी मूलतः पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के अतरौली के रहने वाले थे। बाबू जी के पिता जी का नाम तेजपाल लोधी एवम माता जी का नाम सीता देवी था।बाबू जी का जन्म 6 जनवरी 1932 को हुआ था।सबसे पहले राजनीतिक पारी खेलते हुए 1962 में अतरौली से ही विधायकी का चुनाव लड़े थे,उसके बाद जनसंघ से 1967 में चुनाव लड़ते हुए इसी विधानसभा सीट से 8 बार विधायक भी चुने गए थे।वही 1991 में पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने थे, एवम एटा लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुन कर भी संसद में पहुंचे थे,वही जनपद बुलन्दशहर से भी एक बार लोकसभा के प्रत्याशी रहे थे।
1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अयोध्या का रामन्दिर मुद्दा गरमाने लगा था,वहां पर पहले से ही बाबरी मस्जिद का निर्माण था,6 दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस होने के बाद में नैतिक जिम्मेदारी का हवाला देते हुए अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद दूसरी बारा सितंबर 1997 में कल्याण सिंह जी फिर दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने वही नवम्बर 1999 तक मुख्यमंत्री के तौर पर रहे।
बाबरी विध्वंस के बाद में कुछ ऐसा रहा सफर
अयोध्या बाबरी मस्जिद के विध्वंस होने के बाद में कल्याण सिंह जी कासगंज और अतरौली विधानसभा से विधायक भी रहे थे।उसके बाद में भाजपा सबसे बड़ा दल बन कर उभरी लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और बसपा की मुखिया मायावती ने गठबंधन कर सरकार बनाई और कल्याण सिंह जी विपक्ष के नेता बने थे। 21 अक्टूबर 1997 को बहुजन समाज पार्टी ने कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।कल्याण सिंह पहले से ही कांग्रेस विधायक नरेश अग्रवाल के सम्पर्क में थे और उन्होंने तुरन्त शीघ्रता से नयी पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस का घटन किया और 21 विधायकों का समर्थन दिलाया।इसके लिए उन्होंने नरेश अग्रवाल को ऊर्जा विभाग का कार्यभार सौंपा। उसके बाद में बाबू जी कल्याण सिंह जी ने दिसम्बर 1999 मेंपार्टी छोड़ दी और जनवरी 2004 में पुनःभाजपा से जुड़े। उसके बाद में 2014 में पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं ने मेहनत की और राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया गया उसके बाद में कल्याण सिंह जी ने 4 सितम्बर 2014 को राजस्थान के राज्यपाल पद की शपथ ली। वही उन्हें जनवरी 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का भी अतिरिक्त कार्यभार सौपा गया था।





