नई दिल्ली: तुर्किये के अंतल्या में 9 से 20 नवंबर तक होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन से ठीक पहले प्रतिष्ठित ‘2026 लांसेट काउंटडाउन ग्लोबल रिपोर्ट’ जारी की गई है। इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ते तापमान, जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और इसके दूरगामी प्रभावों को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भारत में स्वास्थ्य, नींद, श्रम घंटे और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है, जिससे देश को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है।
अर्थव्यवस्था को 174 अरब डॉलर का नुकसान
लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन से उपजी समस्याओं के कारण महज एक साल में भारत की अर्थव्यवस्था को करीब 174 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 16,541 अरब रुपए) का भारी नुकसान हुआ है। यह आंकड़ा भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.2 प्रतिशत है। इस आर्थिक नुकसान का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र को उठाना पड़ा है।
श्रम क्षेत्र और कृषि पर सबसे बड़ी मार
- घटे काम के घंटे: भीषण गर्मी और लू (Heat Wave) के कारण श्रमिकों की कार्यक्षमता प्रभावित हुई है। साल 2016 से 2025 के बीच भारत के लोगों को औसतन 2600 घंटे ऐसे समय में काम करना पड़ा जब उन्हें लू लगने का गंभीर खतरा था (जो 1990 के दशक से 200 घंटे अधिक है)।
- श्रम घंटों का नुकसान: इस अवधि में कुल 193 अरब श्रम घंटे बर्बाद हुए, जो 1990 के दशक की तुलना में 75% अधिक है।
- कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित: अर्थव्यवस्था और श्रम घंटों—दोनों ही मामलों में सबसे ज्यादा मार कृषि क्षेत्र पर पड़ी। अकेले कृषि श्रमिकों ने भीषण गर्मी की वजह से 28.32 अरब घंटे कम काम किया, जो कुल श्रम घंटों का 68 प्रतिशत है।
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भारत में लू के दिन और स्वास्थ्य पर प्रभाव
- हीट वेव का प्रकोप: भारत में 2016 से 2025 के बीच प्रति वर्ष औसतन 10.6 दिन लू की स्थिति रही, जिसमें से 5.3 दिन की गर्मी का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से था।
- स्वास्थ्य समस्याएं: विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, बेचैनी और हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ी हैं। इसके अलावा, डेंगू, मलेरिया और हैजा फैलाने वाले बैक्टीरिया भी तेजी से पनप रहे हैं।
- नींद में खलल: रात के समय अत्यधिक गर्मी बढ़ने के कारण लोगों की नींद प्रभावित हुई है। साल 2021 से 2025 के बीच भारत के लोग प्रति वर्ष औसतन 64 घंटे कम सोए, जबकि 1986 से 2005 के बीच यह औसत 61 घंटे था।
वैश्विक आंकड़े: 2023 में गर्मी से 7.10 लाख मौतें
- रिपोर्ट बताती है कि साल 2023 में दुनिया भर में 7.10 लाख लोगों की मौत गर्मी या उससे जुड़ी बीमारियों से हुई, जिसमें 71.5 प्रतिशत मौतों की मुख्य वजह क्लाइमेट चेंज थी।
- साल 2006-2015 के बीच प्रति वर्ष जहां 3,98,400 लोगों की जान जाती थी, वहीं 2016-2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 5,40,800 हो गया (यानी मौतों में 35.8% की वृद्धि)।
तटीय आबादी और पर्यावरण पर संकट
- भारत के करीब 6100 किलोमीटर लंबे तटीय इलाकों में 18.8 करोड़ की आबादी निवास करती है। महासागरों का पानी गर्म होने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिससे 70 लाख से अधिक मछुआरों और तटीय किसानों की आजीविका पर संकट गहरा गया है।
- हालांकि, वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा) के क्षेत्र में रिकॉर्ड 2.10 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हुआ है, जिससे हवा में घुले जहरीले पार्टिकल मैटर (PM 2.5) और प्रदूषण से होने वाली मौतों में कुछ कमी दर्ज की गई है, लेकिन अभी भी कई विकासशील क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश की दरकार है।
मुख्य बिंदु एक नजर में
| पैमाना / क्षेत्ररिपोर्ट के मुख्य आंकड़े | |
| आर्थिक नुकसान | ₹16,541 अरब (174 अरब डॉलर, जीडीपी का 4.2%) |
| श्रम घंटों का नुकसान | 193 अरब घंटे (2016-2025 के दौरान) |
| नींद में कमी | औसतन 64 घंटे प्रति वर्ष (2021-2025) |
| लू (Heat Wave) के दिन | औसतन 10.6 दिन प्रति वर्ष (आधा हिस्सा क्लाइमेट चेंज से जुड़ा) |
| तटीय आबादी पर प्रभाव | 18.8 करोड़ लोग सीधे तौर पर प्रभावित |
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