नई दिल्ली:दशहरा, दीपावली और छठ जैसे महापर्वों की शुरुआत के साथ जहां एक तरफ देश भर में उत्साह का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ बेलगाम महंगाई ने आम जनता का जायका बिगाड़ दिया है। त्योहारी सीजन में रसोई के सबसे अहम हिस्से यानी खाने के तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। सरकार द्वारा आयात शुल्क (Import Duty) घटाए जाने और कंपनियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद खुदरा बाजार में तेल के दामों में कोई कमी नहीं आई है, जिससे उपभोक्ताओं को त्योहारी सीजन में कोई राहत मिलती नजर नहीं आ रही है।

1 साल में 15% से 25% तक महंगे हुए खाद्य तेल

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में खाने के तेल की कीमतों में 15% से 25% तक की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केवल सितंबर महीने की बात करें तो रिफाइंड तेल में करीब 15% और मूंगफली के तेल में 14% तक का इजाफा हुआ है। वर्तमान में अधिकांश प्रमुख खाद्य तेल 200 रुपए प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर चुके हैं, जिससे मध्यम और गरीब वर्ग की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है।

बाजार में खाद्य तेलों के मौजूदा खुदरा दाम (प्रति लीटर/किलो)

क्रमखाद्य तेल का प्रकारमौजूदा कीमत (लगभग)
1मूंगफली का तेल₹231
2सरसों का तेल₹222
3सनफ्लावर ऑयल (सूरजमुखी)₹214
4वनस्पति तेल₹184
5सोयाबीन ऑयल₹180
6पाम ऑयल₹165

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सरकार की कटौती का असर क्यों नहीं दिखा?

त्योहारों के समय बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने सितंबर में एक बड़ा कदम उठाते हुए खाद्य तेलों पर 5% तक आयात शुल्क घटा दिया था।

  • क्रूड पाम ऑयल और क्रूड सोयाबीन ऑयल पर ड्यूटी को 10% से घटाकर 5% कर दिया गया था।
  • क्रूड सनफ्लावर ऑयल पर ड्यूटी को पूरी तरह शून्य (0%) कर दिया गया था।
  • रिफाइंड तेलों पर भी शुल्क में कमी की गई थी और कंपनियों को निर्देश दिए गए थे कि वे घटी हुई लागत का लाभ सीधे ग्राहकों तक पहुंचाएं।

लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं को इसका कोई फायदा नहीं मिला। इसके पीछे मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्य तेलों की कीमतों में लगातार बनी भारी तेजी और विदेशी मुद्रा (रुपये) में कमजोरी को बताया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय तेजी के कारण भारत का आयात बिल भी काफी बढ़ गया है। चालू वित्त वर्ष के पहले 6 महीनों में ही देश को 87,000 करोड़ रुपये का आयात करना पड़ा है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 73,000 करोड़ रुपये था।

अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव और ग्‍लोबल सप्लाई चेन की अड़चनों के चलते फिलहाल निकट भविष्य में उपभोक्ताओं को महंगाई से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।

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