लखनऊ।तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली बार्डर पर आंदोलन कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को भी दिल्ली बनाने की चेतावनी दी है और कहा है कि अगर बात नहीं बनी तो दिल्ली की तरह ही देश के किसान लखनऊ के बार्डर को सील कर देंगे। आपको बताते चले कि सोमवार को मोर्चे के नेताओं ने लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मिशन उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के नाम से दोनों राज्यों में एक बड़ा आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया। संयुक्त किसान मोर्चा के राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव ने कहा कि दिल्ली बार्डर पर चल रहे किसानों के आंदोलन को आठ महीना पूरा हो गया हैं लेकिन न तो किसान विरोधी कानून को रद्द किया गया और न ही एमएसपी के कानूनी गारंटी को लागू किया गया। ऐसे में मोर्चा ने अब मिशन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के नाम से आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है। ये आंदोलन पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर में होने वाली महापंचायत के तुरंत बाद शुरू हो जाएगा। इसके बाद सभी मंडल मुख्यालयों पर महापंचायत का आयोजन होगा और रैलियां निकाली जाएगी। जिसमें तीनों किसान विरोधी कानूनों को रद्द करने और एमएसपी की गारंटी के साथ प्रदेश के किसानों के स्थानीय मुद्दे को भी उठाया जाएगा। दोनों किसान नेताओं ने दावा किया कि आठ महीने का यह आंदोलन किसानों के आत्म सम्मान और एकता का प्रतीक बन गया है। किसान नेता ने कहा कि हम अपने आंदोलन को और तेज, सघन और असरदार बनाने के लिए ही अगले पड़ाव के रूप में मिशन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की शुरूआत करने जा रहे हैं। मिशन के तहत मोर्चा के बैनर तले देशभर के किसान दोनों प्रदेशों के किसानों के साथ मिलकर आन्दोलन को तेज करेंगे। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य यही होगा कि पंजाब-हरियाणा की तरह उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड का हर गांव किसान आन्दोलन का मजबूत किला बने। किसान मोर्चा ने मिशन के तहत यूपी-उत्तराखंड के सभी टोल प्लाजा को फ्री कराने और अडानी-अम्बानी के व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर विरोध प्रदर्शन करने का भी ऐलान किया है। मिशन यूपी-उत्तराखंड के तहत भाजपा व सहयोगी दलों के कार्यक्रमों का विरोध करने तथा इन दलों के नेताओं का बहिष्कार करने का भी ऐलान किया गया। प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता तथा संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि यूपी में मायावती की सरकार ने गन्ने के मूल्यों में प्रति कुंतल 80 रुपये की वृद्धि की थी जबकि अखिलेश यादव की सरकार ने अपने कार्यकाल में 50 रुपये की बढ़ोतरी की थी लेकिन योगी सरकार ने गन्ने के मूल्यों में एक रुपये की वृद्धि नहीं की। क्या योगी उन दोनों नेता से कमजोर नेता हैं जो किसानों के हित में कोई निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। इनकी उम्र भी कम है इन्हें तो गन्ने का रेट 100 रुपये तक बढ़ाना चाहिए।