नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य (Menstrual Hygiene) से जुड़े निर्देशों के पालन में लापरवाही बरतने पर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि राज्यों ने फैसलों को लागू करने से जुड़ी जानकारी नहीं दी, तो उन्हें अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
मुख्य सचिवों को जारी हो सकता है नोटिस
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए सवाल किया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई जानकारी अब तक क्यों नहीं दी है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि राज्यों के मुख्य सचिवों ने उठाए गए कदमों का ब्योरा नहीं दिया, तो उन्हें अवमानना का नोटिस जारी किया जाएगा। हालांकि, अदालत ने इसके साथ ही उन्हें निर्देशों का पालन करने का एक अंतिम अवसर भी दिया है।
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कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में 1 सितंबर को दिए गए आदेश के विशिष्ट बिंदुओं पर विशेष ध्यान देते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लिखित जानकारी मांगे।
- इस प्रक्रिया के लिए केंद्र सरकार एक विस्तृत प्रश्नावली (Questionnaire) तैयार कर सकती है।
- मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर को तय की गई है।
'सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे फैसला'
बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि यदि उनके निर्देश सिर्फ कागजों पर ही रह गए, तो इस अधिकार का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रह जाएगा। अदालत ने कहा, "हमने मासिक धर्म स्वच्छता/स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा घोषित किया है। अगर हमारे फैसले की बातें सिर्फ कागजों पर ही रह गईं, तो केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को कैसे लागू करेंगे?"
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यह पूरी पहल देश के दूर-दराज के इलाकों की उन युवा लड़कियों के हित में की गई है, जिन्हें अक्सर मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं और सुविधाओं के अभाव के कारण बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।
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