नई दिल्ली
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वैश्विक होड़ में दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां (हाइपरस्केलर्स) पानी की तरह पैसा बहाने को तैयार हैं। यूबीएस ग्लोबल रिसर्च (UBS Global Research) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की छह बड़ी टेक कंपनियां साल 2026 से 2030 के बीच एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7.7 ट्रिलियन डॉलर ($7.7 Trillion) का भारी-भरकम निवेश करने जा रही हैं।
इसमें से लगभग 6.8 ट्रिलियन डॉलर का खर्च उनके नियमित बजट से बिल्कुल अलग (अतिरिक्त) होगा। हालांकि, इस ऐतिहासिक निवेश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या कंपनियां इस पूंजी पर उचित रिटर्न (Monetization) हासिल कर पाएंगी?
1 ट्रिलियन डॉलर के मुनाफे की अभूतपूर्व चुनौती
अब तक सॉफ्टवेयर, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स जैसे एसेट-लाइट (कम पूंजी वाले) बिजनेस के जरिए ये टेक कंपनियां टैक्स से पहले 40 फीसदी से अधिक का रिटर्न (ROIC) कमाती रही हैं। लेकिन एआई डेटा सेंटर्स और भारी भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण ने इस पूरे गणित को बदल दिया है।
- रिटर्न ऑन कैपिटल (ROIC) में गिरावट: यूबीएस का अनुमान है कि भारी एसेट आधारित मॉडल में शिफ्ट होने से कंपनियों के निवेश पर मिलने वाले रिटर्न (ROIC) में 20 से 25 प्रतिशत अंकों की गिरावट आ सकती है।
- कमाई का विशाल लक्ष्य: यदि ये कंपनियां 2031 तक अपने निवेश पर 15% का रिटर्न बनाए रखना चाहती हैं, तो उन्हें ब्याज और टैक्स से पहले लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त लाभ (EBIT) कमाना होगा।
- अतिरिक्त रेवेन्यू की जरूरत: मौजूदा क्लाउड मार्जिन के आधार पर इस EBIT लक्ष्य को पाने के लिए कंपनियों को 3.4 ट्रिलियन डॉलर का नया/अतिरिक्त रेवेन्यू जुटाना होगा, जो इनकी वर्तमान संयुक्त कमाई के लगभग दोगुने के बराबर है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? (डॉट-कॉम व टेलीकॉम दौर से तुलना)
यूबीएस का कहना है कि सिर्फ एआई से अर्थव्यवस्था की प्रोडक्टिविटी (उत्पादकता) बढ़ना ही काफी नहीं होगा, बल्कि कंपनियों को उस उत्पादकता को सीधी कमाई में बदलना होगा।
यदि एआई वैश्विक उत्पादकता में 0.5% से 1.5% का भी इजाफा करता है, तो 2031 तक ग्लोबल जीडीपी में 3 से 10 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, रिपोर्ट ने 1990 के दशक के डॉट-कॉम और टेलीकॉम बूम का उदाहरण देते हुए आगाह किया है—उस दौर में केबल और नेटवर्क कंपनियों ने इंफ्रास्ट्रक्चर में खरबों डॉलर लगाए जिससे पूरी अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ, लेकिन वे खुद बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं कमा सकीं। असली मलाई बाद में आई इंटरनेट और स्मार्टफोन कंपनियों ने खाई।
राहत की बात: आज के हाइपरस्केलर्स के पास पुरानी टेलीकॉम कंपनियों की तुलना में बेहद मजबूत बैलेंस शीट और कमाई के बहुआयामी डिजिटल रास्ते मौजूद हैं।
कोरवीव और बॉन्ड मार्केट का दबाव
हाल ही में कोरवीव (CoreWeave) जैसी नियोक्लाउड कंपनियों के बॉन्ड में नरमी से बाजार में कुछ घबराहट देखी गई थी। हालांकि, यूबीएस के इमर्जिंग मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट सुनील तिरुमलाई ने साफ किया कि नियोक्लाउड कंपनियों की हिस्सेदारी अगले 4-5 वर्षों के कुल एआई डेटा सेंटर खर्च में केवल 5% से 7% ही है। इसलिए इसे पूरे एआई विजन की नाकामी नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा, डेटा सेंटर्स के संचालन के लिए पर्याप्त बिजली की उपलब्धता, कानूनी अड़चनों को दूर करना और पावर ग्रिड क्षमताओं को बढ़ाना भी एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता के लिए अनिवार्य शर्तें हैं।
भारतीय बाजारों पर कोई असर नहीं, मजबूती कायम
वैश्विक स्तर पर टेक शेयरों और बॉन्ड यील्ड में मची उथल-पुथल के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर है। यूबीएस के अनुसार, एशियाई और वैश्विक टेक शेयरों में बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार काफी मजबूत और स्थिर बना हुआ है। इससे स्पष्ट है कि ग्लोबल एआई खर्च और क्रेडिट मार्केट के दबाव का भारतीय बाजारों पर कोई सीधा प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।
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