वाराणासी।आध्यात्मिक नगरी काशी की विश्व विख्यात नागनथैया लीला ने एक बार फिर अपनी वर्षों पुरानी परंपरा को आज जीवित कर दिया।तुलसीदास घाट पर कृष्ण लीला को जिस जिस ने भी देखा वो भावविभोर होकर देखता ही रह गया। लाखों की तादाद में भीड़ ने काशी में गंगा को यमुना में बदलते हुए देखा।

सोमवार को काशी के लोग यमुनवासी के रूप में थे।इस लीला के जरिए गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का भी संदेश दिया गया।आध्यात्मिक नगरी काशी में गोस्वामी तुलसीदास घाट पर शाम होते ही विश्व विख्यात नागनथैया लीला का मंचन हुआ।करीब 500 साल पुरानी इस परंपरा को देखने के लिए लाखों की तादाद में भीड़ घाट पर मौजूद थी।

मेला आयोजक ने बताया कि 2021 में आयोजित इस लीला को देखने के लिए फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से विश्वभर के लोग जुड़े रहे।इस लीला के माध्यम से लोग भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन करते हैं।करीब 500 साल पूर्व गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस लीला को शुरू किया था।तब से लेकर आज तक हम सभी आयोजक लोग प्रशासन के साथ मिलकर इस लीला को संपन्न कराते हैं।

मेला आयोजक ने आगे बताया कि इस पांच मिनट की लीला के जरिए प्रयत्क्ष तौर पर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए लोग सालभर तक इंतजार करते हैं। जब तुलसीदास जी ने इस लीला को शुरू कराया था, तो उसके पीछे उनकी यही मंशा थी कि हमारे समाज और नई पीढ़ी के लोगों में भगवान के चरित्र की यह सीख देखने को मिले।तुलसीदास जी ने लीला के माध्यम से समाज के हर वर्ग को एकसूत्र में पिरोने का कार्य किया है।

आपको बता दें कि साढ़े तीन बजे जब आध्यात्मिक नगरी काशी की गंगा यमुना में बदलती हैं तो उस समय सारे काशी के लोग यमुनवासी हो जाते हैं।भगवान श्रीकृष्ण जैसे ही कदम्ब के पेड़ से यमुना नदी में अपने मित्र की गेंद को लाने के लिए छलांग लगाते हैं तो पूरा घाट जय कृष्ण, महादेव के जयकारों से गूंज उठता है। भगवान कृष्ण जब अपने बाल स्वरूप के रूप में गंगा की लहरों के बीच कालिया नाग का मर्दन करते हैं। तब अटूट मित्रता और अहंकार के सर्वनाश का लोगों को दर्शन होता है।