रांची।देश भर में मां दुर्गा के आगमन के साथ उपासना और आराधना का दौर शुरू है।मां दुर्गा की उपासना और आराधना के बीच राजधानी रांची में भी दुर्गा पूजा के कई रंग दिखायी दे रहे हैं। कही पर पुरानी परंपरा और मान्यता को निभाते हुए मां दुर्गा की पूजा हो रही है, तो कही पर कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए लोग मां दुर्गा की शरण में माथा टेक रहे हैं। राजधानी का मजूमदार परिवार भी चर्चा में है।



राजधानी रांची के राधेश्याम गली में 108 साल पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का सिलसिला जारी है।बांग्लादेश से शुरू हुई मां दुर्गा की आराधना देश बंटवारे के बाद से भारत में भी उतने ही उत्साह और उमंग के साथ की जा रही है।यहां मां दुर्गा की बायी ओर भगवान गणेश विराजमान नजर आयेंगे,जबकि भगवान कार्तिक का स्थान मां दुर्गा की दायी ओर देखने को मिलेगा।



आइए जाने मजूमदार परिवार की परंपरा के बारे में



आपको बता दें कि इसकी शुरुआत देश के बंटवारे से पहले हुई थी।तब भानु मजूमदार के पिता ने बांग्लादेश में कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा की आराधना शुरू की थी।कुछ सालों तक ऐसा ही चलता रहा।देश के बंटवारे के बाद मजूमदार परिवार रांची में आ कर बस गया।नवरात्रि में बलि प्रथा का पुराना इतिहास रहा है लेकिन भानु मजूमदार के पिता को बाद में ऐसा लगा की शायद आने वाली पीढ़ी इसे नही निभा पाएगी और इस लिए वे बलि की प्रथा को रोकने का फैसला किया,लेकिन उसी साल उनकी मौत हो गई।परिवार के लोगों को ऐसा लगा कि मां दुर्गा नाराज हो गई हैं और इसके बाद फिर से बलि प्रथा की शुरुआत कर दी गई।बलि के तौर पर कोहड़ा, खीरा, ईख को मां के चरणों में चढ़ाया जाता है।



सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात है कि भगवान गणेश और कार्तिक के स्थान में परिवर्तन इसको लेकर भानु मजूमदार का कहना है कि जब भी पूजा अर्चना शुरू होती है तब धूप,अगरबत्ती या आरती के समय पुरोहित दाहिनी ओर से हाथ को उठाते हैं, इसलिये सबसे पहले भगवान गणेश की ओर से ही श्री गणेश करने की पुरानी परंपरा है।



बांग्लादेश में भी ठीक इसी प्रारूप में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। आज मजूमदार परिवार का हर एक सदस्य चाहे वो जहां कही भी हो, मां दुर्गा की पूजा के लिए रांची जरूर पहुंचता है। मजूमदार परिवार के आज की पीढ़ी में अपनी पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने और इसे बचाये रखने का संकल्प दिखता है।